Monday, December 16, 2013

बनावटी प्राकृतिक


जापान की मियोको मियाज़ाकी २००३ में जब मिस वर्ल्ड बनीं तो उनसे पूछा गया कि, “आपकी जिन्दगी की सबसे बड़ी व्यक्तिगत उपलब्धि क्या है?” और उन्होंने जवाब दिया कि, “अपनी लेफ्टहैंडेडनेस (बाएं हाथ इस्तेमाल करने की आदत) पर विजय पाना.” क्योंकि जिस संस्कृति से वो ताल्लुक रखतीं हैं वहां बाएं हाथ का इस्तेमाल अशुभ माना जाता है. माँ-बाप न सिर्फ बच्चों को ‘सीधा’ करने के लिए जोर ज़बरदस्ती करते हैं बल्कि लड़कियों की शादी के समय भी उनके बायाँहत्था होने की बात उनके भावी ससुराल वालों से छुपाई जाती है. कई एशियाई देशों और धर्मों में में बाएं हाथ का प्रयोग शुभ कार्यों के लिए निषिद्ध है.
धर्म को हमेशा दो ध्रुवों की दरकार रही है- एक शुभ होगा और दूसरा निषिद्ध. बुराई पर अच्छाई की विजय की कहानियों से सभी धर्म पटे पड़े हैं. एक के पवित्र होने के लिए दूसरे का अपवित्र होना ज़रूरी है. एक प्रक्रिया पर प्राकृतिक होने का ठप्पा लगने के लिए दूसरी को अप्राकृतिक होना होगा. किसी समय दास-प्रथा बाइबिल के हिसाब से सही मानी जाती थी. क्यूंकि अश्वेत लोग प्राकृतिक रूप से ही बुद्धिहीन और शारीरिक रूप से बलवान माने गए थे जिन्हें नियंत्रित रखने और आदेश देने के लिए ‘प्राकृतिक’ रूप से ज्यादा बुद्धिमान सफ़ेद चमड़ी वालों का उन पर राज करना न्यायोचित था. एक वक्त ऐसा भी था जब औरतों का प्रसव-पीड़ा सहना ज़रूरी था और उनकी मदद करने वाली दाइयों को मौत तक की सज़ा मिलने का प्रावधान था क्यूंकि ऐसी मदद ‘अप्राकृतिक’ और भगवान् की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ थी. हिटलर ने यहूदियों के दमन को ‘प्राकृतिक’ ठहराने के लिए डार्विन के सिद्धांत के बेतुके मतलब निकाल दिखाए थे. उसने दो नस्लों के मिलन को घातक बताया था. हमारे देश में ऐसे तर्क जातियों के सन्दर्भ में दिए जाते रहे हैं. ‘शुद्ध-अशुद्ध’ के ताम- झाम ने तमाम जातियों का मंदिर में प्रवेश करना तक वर्जित कर रखा था.
गौरतलब है कि प्राकृतिक-अप्राकृतिक की ये श्रेणियां और इनमें आने वाले समूह हमेशा एक जैसे नहीं रहे. ये देश-काल और सन्दर्भ के हिसाब से बदलते रहें हैं, निर्भर करता है कि गिनती या ताकत के हिसाब से किस समूह का पलड़ा भारी बैठता है. तभी तो मासिक धर्म जैसी प्राकृतिक प्रक्रिया के साथ भी ‘अपवित्र’ होने का तमगा लगा है क्यूंकि ये औरतों से जुड़ा है. किस हद तक इस पवित्र-अपवित्र का पालन होगा ये इस बात पर भी निर्भर करता है कि उस समय किसी सभ्यता की जरूरतें क्या हैं? उदाहरण के तौर पर गर्भपात को ले लीजिये, अमेरिका में ये एक बड़ा मुद्दा है जहां राजनेताओं को ‘प्रोचॉईस’ या ‘प्रोलाईफ़’ के रूप में अपना सैद्धांतिक पक्ष स्पष्ट करना होता है. जबकि भारत में बढ़ती जनसंख्या की चिंता के चलते तमाम धार्मिक लफ्फाजियों के बावजूद औरतों को ये अधिकार बिना लड़े मिला हुआ है और कन्या भ्रूणहत्या में होने वाले इसके इस्तेमाल की तो बात ही मत कीजिये.
धर्म की दी परिभाषाएं कभी तोड़ी-मरोड़ी भी गयीं हैं और कभी पीछे भी छोड़ दी गयीं हैं लेकिन हमेशा बहुसंख्यकों की सुविधा के हिसाब से. ये लचीलापन इस बात का सबूत है कि ‘प्राकृतिक-अप्राकृतिक’ की पूरी अवधारणा ही मानव निर्मित है. बहुसंख्यक और ताकतवर समूह की परिभाषा ही मानदंड होगी चाहे वो दायें हाथ से लिखना हो या परलैंगिकता (heterosexuality). बाकी सबको या तो इनके जैसा बनना होगा या फिर इनके जैसे होने का नाटक करना होगा. चाहे दायेंहत्थे लोगों को ही ध्यान में रख कर कर बनाए गए उपकरण हों या परलैंगिकों के हिसाब से ही बने नियम-कानून हों, बाकी लोगों को ख़ुद को इनके लिए डिज़ाइन की गयी दुनिया  में ख़ुद को ढालना होगा.
अगर आप परलैंगिक हैं तो आपके लिए कल्पना करना भी मुश्किल है कि अपने जननांगों का अपनी मर्ज़ी से अपने ही घर के एकांत में इस्तेमाल करने का अधिकार भी किसी को लड़ कर लेना पड़ता है. आप इतने विशिष्ट हैं कि आपको ख़ुद अपने प्रिविलेज (विशेषाधिकार) का अंदाज़ा नहीं है. हाई कोर्ट के आर्डर के बाद जिन्होनें अपनी पहचान ज़ाहिर करने की हिम्मत की थी, सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद उनका भविष्य एक बार फिर अधर में है. उनकी नींद कैसी होती होगी जो ये सोच कर सोते होंगे कि सुबह तक पता नहीं वो ‘लीगल’ रह जायेंगे या नहीं, क्या आप ये समझ सकतें हैं?

ऐसे में ये बहस बेमानी है कि फ़ैसला समलैंगिकों के ख़िलाफ़ है या समलैंगिक संबंधों के. अगर चोरी करना अपराध है तो चोर ही तो अपराधी ही हुआ. कर्ता और कर्म एक दूसरे के बिना परिभाषित नहीं हो सकते. इसलिए फैसला पूरे LGBT समुदाय के ख़िलाफ़ है. वैसे भी लैंगिकता कोई व्यवसाय या संपत्ति नहीं है. ये  किसी की पहचान का अहम् हिस्सा है जो उनको परिभाषित करता है. उसे अपराधिक गतिविधि घोषित करना उनके मानवाधिकारों का उल्लंघन है. दरअसल हमारे समाज में हर चीज़ फ़र्टिलिटी के चारों तरफ़ घूमती है. परलैंगिक जोड़ों की शादियों के महिमामंडन के पीछे वंशवृद्धि की कामना छिपी है. अब वो प्राकृतिक या किसी और व्यक्तिगत कारणों से बच्चे पैदा न करें ये अलग बात है. लेकिन बच्चों के जन्म से ही उन्हें भविष्य में अपनी इस ज़िम्मेदारी के लिए तैयार करने की कोशिशें शुरू हो जाती हैं. जहां शादियाँ व्यक्तिगत ना होकर सामाजिक दायित्व हैं वहां बिना संतानोत्पत्ति की संभावना वाले दैहिक सम्बन्ध अगर अप्राकृतिक घोषित कर दिए गए हों, तो हैरानी कैसी? शुद्ध-निषिद्ध के मामले में हर समाज का अपना इतिहास है जो धीरे-धीरे हमारी समझ में भी घुसपैठ करता जाता है. हम जब पैदा होते हैं तो ये मानदंड समाज में पहले ही इस्तेमाल हो रहे होते हैं. हमारे हर फैसले में हमसे ज्यादा हमारे समाजीकरण का हाथ होता है. ऐसे में समलैंगिकता का हमारे समाज में heterosexuality के समानांतर एक विकल्प ना होना ही ख़ुद समलैंगिकता के न होने का प्रमाण नहीं माना जा सकता.

प्राकृतिक-अप्राकृतिक के तर्कों के अलावा, 377 के हिमायती बहस को विकास की तरफ ले जाने पर भी अमादा हैं कि जिस देश में लोगों की मूलभूत जरूरतें और महिला सशक्तिकरण का उद्देश्य अभी तक पूरा ना हुआ हो वहां समलैंगिकों के अधिकारों पर कैसे ध्यान दिया जा सकता है? ये कोई नई बात नहीं है. किसानों और जनजातियों से जमीन अधिग्रहण करने के लिए भी देश के विकास की दुहाई दी जाती रही है. लेकिन यहाँ तो मसला पहचान की राजनीति का है, किसी प्राकृतिक संसाधन का नहीं. वैसे भी विकास के नाम पर लैंगिक अल्पसंख्यकों की बलि क्यों चढ़े?


लैंगिक पहचान के निर्धारण के अधिकार और समलैंगिकता की बहस को पश्चिमी संस्कृति से आयातित होने के तर्क के विरोध में खजुराहो से लेकर अर्धनारीश्वर तक के उदाहरण गिनाये जा सकते है. लेकिन ऐसा क्यूँ करें? संस्कृति सिर्फ़ वो नहीं है जो इमारतों और शास्त्रों में रुक गयी है. ये पारंपरिक कपड़ों-गहनों और पकवानों में भी नहीं है जिनकी याद कभी-कभी त्यौहारों पर आती है. कोई संस्कृति सिर्फ उन विशिष्टताओं- विचत्रताओं में नहीं बसती जिनकी फ़ोटो पोस्टकार्डों पर छाप कर विदेशी पर्यटकों को लुभाया जाता है. संस्कृति वो है जिसे हम हर रोज़ जीते हैं. लोग बदलते हैं इसलिए संस्कृति भी बदलती रहती है. सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के विरोध में लोगों का खुल कर के सामने आना इस बात का सबूत है. कभी लड़के-लड़कियों के लिए अलग-अलग शिक्षा थी क्योंकि तकनीकी विषयों में लड़के प्राकृतिक रूप से ज्यादा समझदार माने जाते थे. आज ये बात सुनने में भी हास्यास्पद लगती है क्यूंकि हम बदल चुके हैं. समलैंगिक संबंधों को कानूनी जामा पहनाने का मुद्दा आज से पचास साल पहले महत्त्वपूर्ण रहा हो या ना रहा हो, लेकिन अब है. ये ज़ाहिर करना ज़रूरी है. अच्छा होगा कि हम राजनैतिक पार्टियों को भी इस विषय में अपना पक्ष स्पष्ट करना के लिए कहें ताकि जो रास्ता न्यायपालिका ने बंद कर दिया वो बाज़रिये विधायिका खुल सके. 


वाशिंगटन पोस्ट पर एक अच्छा मैप है. समलैंगिकता के बारे में हमारे रवैये की वजह से हम किन देशों के साथ जा खड़े हें हैं  एक बार ये देख लेना भी अच्छा होगा- http://www.washingtonpost.com/blogs/worldviews/wp/2013/12/11/a-map-of-the-countries-where-homosexuality-is-criminalized/

(हिंदी में sex और gender के लिए दो अलग-अलग शब्द नहीं हैं, ऐसे लेख लिखते समय यही सबसे बड़ी बाधा होती है. मेरे शब्द चुनाव से आप सहमत या असहमत हो सकते हैं, कोई नए शब्द भी सुझाए जा सकते हैं.)

(ये लेख जनसत्ता में प्रकाशित है- http://www.jansatta.com/index.php?option=com_content&task=view&id=58376&Itemid=)


Saturday, November 23, 2013

न्याय की भी 'प्रॉक्सी'?

हाल ही में समाज के अलग- अलग वर्गों से मिलती-जुलती खबरें आईं. तरुण तेजपाल ने एक रिपोर्टर से छेड़छाड़ की, दिल्ली में एक वरिष्ठ जज के एक लॉ इन्टर्न से छेड़छाड़ करने का मामला सामने आया और अफसरों, विधायकों और उनकी बीवियों ने अपनी घरेलू नौकरानी के साथ हैवानियत दिखाई. आख़िरी मामला भी सीधे तौर पर लगे ना लगे पर है लिंग आधारित हिंसा ही. घरेलू नौकर के रूप में महिलाओं को ही वरीयता मिलती है क्यूंकि हमारे हिसाब से एक पुरुष नौकर के मुक़ाबले वो ज्यादा दब्बू होंगी, कम तनख्वाह लेंगी और हमारा गुस्सा सहने की सीमा भी उनमें ज्यादा होगी. घर की चारदीवारियों में उनके साथ की गयी हिंसा को घर का अंदरूनी मामला बताकर कानूनी जांच को भी रोका जा सकता है. ये घर आखिर उन घरेलू नौकरों के कार्यस्थल ही हैं. फिर ये भी कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न का ही तो मामला हुआ! 
‘आजकल ये घटनाएं कितनी बढ़ गयीं हैं?’ आमतौर पर ऐसी खबरों के बाद हमारी प्रतिक्रया कुछ ऐसी ही होती है. सुनकर ऐसा लगता है कि पहले हम कुछ सही कर रहे थे और अब कुछ गड़बड़. पहले हम जो कर (नहीं) रहे थे उसकी लिस्ट कुछ यूं है-
-    माध्यम वर्ग और उच्च माध्यम वर्ग की स्त्रियों को उनके घर वाले नौकरियाँ नहीं करने दे रहे थे. (ध्यान रहे कि औरतों का काम करना कोई नया नहीं है, निम्न वर्ग की औरतें हमेशा से घरेलू नौकरों और दिहाड़ी मजदूर के तौर पर काम करती आईं हैं, हालांकि उनके शोषण पर कभी ध्यान नहीं दिया गया.)
-    महिलाओं का नाईट शिफ्ट में काम करना कानूनन वैध नहीं कर रहे थे, भले ही वो तमाम फैक्ट्रियों, अस्पतालों और कॉल सेंटरों में काम कर रहीं थी. इससे वे आर्थिक या लैंगिक शोषण की शिकायत करने की सोच भी नहीं सकतीं थी.
-    सेक्सुअल हरासमेंट कमेटी के लिए कोई दिशानिर्देश नहीं दे रहे थे. इसके बावजूद कि ‘सेक्सुअल हरासमेंट ऐट वर्क प्लेस’ का सबसे वीभत्स मुद्दा हमारे देश में ही हुआ है, (अरुणा शानबाग, जिन्हें हम इच्छा-मृत्यु के लिए ज्यादा जानते हैं) विशाखा गाइडलाइन्स आने में सालों लग गए.
बहरहाल कई क़ानून आये और स्थिति बदली. अगर सेक्चुअल हरासमेंट से मुक्त कार्यस्थल अब नहीं है तो पहले भी नहीं थे. हर तरह के रोजगार में महिलाओं की बढ़ती घुसपैठ, क़ानून की उपलब्धि और  लैंगिक उत्पीड़न की विस्तृत की गयी परिभाषा ने इन मुद्दों को ज्यादा गोचर बनाया है बस. हालांकि इसका लाभ सिर्फ एक ख़ास वर्ग ही उठा पा रहा है. इसकी वजह आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े वर्ग की औरतों पर अपनी रोज़ी- रोटी बनाए रखने की मजबूरी होना भी है. ऐसे में ये हैरानी की बात नहीं कि विरोध की ज्यादातर आवाजें तुलनात्मक रूप से समृद्ध परिवारों की लड़कियों की तरफ से आ रही है.
हर एक कार्यस्थल पर रोजगार देने और पाने वाले के बीच असमानता का रिश्ता होता है. बॉस की बातें कितनी भी बेतुकी लगें उन्हें अक्सर मानना ही होता है. सहमति-असहमति का प्रश्न तो तब है जब असहमति जताना एक विकल्प हो न कि नौकरी छुड़वाने या प्रमोशन रुकवाने का सबब. ऐसे में तरुण तेजपाल का इसे ‘जजमेंट एरर’ या ‘शराब का नशा’ कहना कितना हास्यास्पद है! यह तो एकदम सटीक निर्णय है. अपराधकर्ता को पता है कि उसकी सत्ता कहाँ चलेगी.  नौकरी और बॉस की कृपादृष्टि बचाए रखने के लिए कौन चुप रहेगा? नहीं रहेगा तो क्या धमकियां देनी हैं? और फिर ‘मौनम् सम्मति लक्षणं’ की तर्ज पर इसे ‘कन्सेन्चुअल’ का जामा कैसे पहनाना है? समाज की सफ़ाई करने की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले भी अपनी इस ताकत का इस्तेमाल लैंगिक उत्पीड़न के लिए कर रहें हैं तो इसमें हैरानी कैसी? जेंडर सेंसिटिविटी न तो हमारे पाठ्यक्रमों का हिस्सा हैं और ना ही बौद्धिकता नापने की कसौटी. वैसे भी किसी बौद्धिक निर्वात में रहकर लैंगिक समानता की बातें करना एक बात है, व्यवहारिकता की बयार के बीच उन सिद्धांतों को संभाले रखना बिल्कुल अलग.
ये एक अच्छा संकेत है कि तरुण तेजपाल मामले में सभी एकमत होकर कानूनी जांच की मांग कर रहें हैं लेकिन इसमें शायद हमारा एक बड़े आदमी को मटियामेट होते देखने का सुकून भी शामिल है, तमाम चैनलों की चटखारे ले कर की जा रही रिपोर्टिंग इस कुंठा का सबूत है. तेजपाल ने अपनी पत्रकारिता से कई धुर विरोधी भी पैदा किये हैं, जो इस बहती गंगा में हाथ धो रहे हैं और विक्टिम की पहचान छुपाना और मुद्दे के साथ संवेदनशीलता बरतना हाशिये पर है. ऑनलाइन एक्टिविज़म की चिल्ला-चिल्ली के बीच पीड़िता का पक्ष गायब है.
हम हमेशा यही मानते और मनवाते आये हैं कि लैंगिक उत्पीड़न में जो आहत हुआ उसकी कोई ग़लती नहीं, चाहे उसने शराब पी हो या कैसे भी कपड़े पहने हों, उसका ना कहने का अधिकार उसके अतीत में कही गयी ‘हाँ’ के भार से मुक्त हो. अपना चरित्र की दृढ़ता साबित करने का भार उस पर क्यों आये? ठीक उसी तर्क से भीड़ की न्याय-लिप्सा शांत करने का भार उस पर क्यूं आये? क़ानून की धाराएं सबके लिए एक जैसी हो सकतीं हैं लेकिन न्याय की परिभाषा नहीं. न्याय मिलने और मुद्दे के समापन का संतोष किसी को माफी देकर भी मिल सकता है, किसी को आतंरिक शिकायत करके, किसी को दूसरों को जागरूक करके तो किसी को सिर्फ ब्लॉग लिखकर जैसा कि उस लॉ इन्टर्न ने किया. न्याय सबके लिए टेलर मेड नहीं हो सकता. इन्हीं सब कारणों से ‘आउट ऑफ़ कोर्ट सेटलमेंट’ या आतंरिक ‘एंटी सेक्चुअल हरासमेंट कमेटी’ बनाने जैसे प्रावधान है. ये सच है कि सामाजिक दबावों के चलते भी पीड़ित को केस वापस लेने पर मजबूर किया जा सकता है. लेकिन आन्दोलनों का दबाव बना कर विक्टिम को पुलिस रिपोर्ट दर्ज करने पर मजबूर करना और न करने पर कमज़ोर कह कर उसकी आलोचना करना उस सामाजिक दबाव का दूसरा रूप ही तो है. कानूनी प्रक्रियाएं लम्बी चलतीं है. किसी को न्याय पाने का संतोष अगर उससे पहले ही मिल जाय और फिर भी उसे ये कड़वा अनुभव वकीलों और पुलिसवालों के क्रॉस-एग्ज़ामिनेशन में बार-बार दोहराना पड़े तो क्या ये उसके साथ एक और अन्याय नहीं है? ये सच है कि ज्यादातर अपराध सिर्फ व्यक्ति नहीं स्टेट के विरुद्ध होते हैं. पीड़ित अगर फैसले लेने की दशा में ना हो तो उसकी और से किसी भी प्रत्यक्षदर्शी या जागरूक नागरिक को रिपोर्ट लिखाने का हक़ है जैसा कि घरेलू हिंसा के मामलों में अक्सर होता है. लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि पीड़ित पर सामाजिक न्याय की परिभाषाएं थोपी जाएँ और उन पर समाज के सामने एक आदर्श या उदाहरण प्रस्तुत करने की नैतिक ज़िम्मेदार मढ़ दी जाय. स्टेट की ज़िम्मेवारी है के अपने नागरिकों को न्याय पाने के तमाम विकल्प और रास्ते उपलब्ध कराये. एक्टिविस्ट और स्टेट मिलकर ज्यादा से ज्यादा ये सुनिश्चित कर सकते हैं कि शिकायतकर्ता के पास हर विकल्प खुला रहे. अब उसे कौन सा विकल्प अपनाना है ये अधिकार उसी के पास रहे तो अच्छा है. सामाजिक दबाव और जबरन समाज सुधार के दो ध्रुवों के बीच संतुलन बनाना ज़रूरी है जो कि शिकायत करने वाले की इच्छा का सम्मान करने पर ही मुमकिन है.


Friday, November 8, 2013

एक ऋतुमती परुष के प्रसव की कहानी

ये कहानी अरुणाचलम् मुरुगनाथम् के जीतने से ज्यादा हमारे हारने की है. मुरुगनाथम् तमिलनाडु के कोयम्बतूर जिले के ग्रामीण इलाके के रहने वाले हैं. उनकी जिन्दगी अपने गाँव के बाकी लोगों जैसी ही थी, नाम-मात्र की पढ़ाई, फैक्ट्री में नौकरी, कच्ची उम्र में घर वालों की पक्की की हुई शादी.
पत्नी को एक दिन हाथ पीछे बांधे, कुछ छुपा कर ले जाते देखकर पूछा, ‘क्या छुपा रही हो?’
तुमसे मतलब?’ पत्नी से रूखा सा उत्तर मिला.
लेकिन मुरुगनाथम् ने पत्नी के हाथ में मैला कुचैला कपड़ा देख ही लिया जिसे हम अपने घरों में झाड़ने-पोंछने के लिए भी इस्तेमाल नहीं कर पायेंगे. वो वजह ताड़ गए और पत्नी से पूछा कि वो टी.वी. पर दिखाए जाने वाले सेनेटरी नैपकिन का इस्तेमाल क्यूँ नहीं करतीपत्नी के कहा कि ऐसा किया तो घर के लिये दूध खरीदना बंद करना पड़ेगा. नयी-नयी पत्नी को इम्प्रेस करने के लिए सेनेटरी नैपकिन खरीदने के इरादे से अरुणाचलम् मुरुगनाथम् एक दूकान में घुसे. दुकानदार नैपकिन के पैकेट जब भी किसी को देता तो इधर-उधर देखकर जल्दी-जल्दी उन्हें अखबार में लपेटकर काली पन्नियों में छुपा देता, मानों कोई प्रतिबंधित ड्रग्स बेच रहा हो. उन्होंने नैपकिन का एक पैकेट हाथ में उठाया, वजन कोई दस ग्राम रहा होगा और दाम दो सौ से भी ऊपर. हैरान-परेशान मुरुगनाथम् ने एक नैपकिन खुद ही बनाने का फैसला किया. रूई खरीदी, उसके ऊपर कपड़ा लगा कर आढ़ी-टेढ़ी सिलाई मारी और बीवी को पकड़ा दिया. एक तो असंतुष्ट बीवी का खराब फीडबैक और उस पर इस बात की शर्म कि अपने घर-गाँव की औरतों के लिए पैड बनाने के लिए एक विदेशी कंपनी की जरूरत है. बस तब से कम दाम के नैपकिन बनाने की खब्त सवार हो गयी. नयी-नयी तरकीबों से पैड बनाते और पत्नी को पकड़ा देते. पत्नी महीने में एक ही बार फीडबैक दे सकती थी, इसलिए बहनें उनका अगला निशाना बनी. लेकिन कोई इस बारे में बात तक करने को राज़ी नहीं था. हारकर उन्होंने शहर के मेडिकल कॉलेज की लड़कियों से संपर्क साधने की कोशिश की. उनमें भी वही झिझक. शर्म-धरम की संस्कृति से ऐसे बेशरम प्रयोगों के लिए वॉलंटीयर कहाँ से आते? ये हमारी शिक्षा व्यवस्था की हार है जो सामाजिक रूढ़ियों के आगे अक्सर दम तोड़ देती है.
वैसे भी जो बरसों से पीरियड्स के नाम पर सकुचा जाना ही सीखती आयीं हैं, जिनकी दादी-नानी-माँ ने मिलकर उन्हें मासिक धर्म में सिर्फ खुद को अपवित्र समझने का पाठ पढ़ाया है, उनमें ऐसी बेझिझक निर्भीकता कहाँ से आयेगी कि वो किसी पुरुष के सामने इस बारे में बात कर सकें. कुछ लड़कियों के फीडबैक के सहारे प्रयोग थोड़ा आगे बढ़ा लेकिन मुरुगनाथम् समझ गए थे कि लड़कियों के भरोसे नहीं रहा जा सकता. बस, फिर जैसे नील आर्मस्ट्रांग चन्द्रमा पर जाने वाले पहले पुरुष बने थे, तेनजिंग नोर्गे एवरेस्ट पे चढ़ाई करने वाले पहले पुरुष बने थे वैसे ही मुरुगनाथम् सेनेटरी पैड पहनने वाले पहले पुरुष बन गए. जानवरों के खून से भरा एक लचीला ब्लैडर उनके हाथ में होता जो एक नली के सहारे सेनेटरी पैड से जुड़ा होता. मुरुगनाथम् चलते-फिरते, साइकिल चलाते थोड़ा-थोड़ा खून पम्प करते जाते. उनके अनुसार ये उनके सबसे मुश्किल दिन थे. औरतों की समस्याएँ जानने के लिए उन्होंने खुद औरतों की दिनचर्या और दिमाग में उतरने फ़ैसला किया. यहाँ वो हमारी पौरुष की परिभाषा को हराते हैं और मासिक धर्म से जुड़े अशुद्धि और कमज़ोरी जैसे पूर्वाग्रहों को भी. और ऐसा करके अच्छा ही करते हैं.
लेकिन अब तक उनकी पत्नी शांती का धैर्य जवाब दे चुका था. उन्हें शक होने लगा कि मुरुगनाथम् लड़कियों से बात करने के बहाने ढूंढते रहते हैं. वो उन्हें छोड़कर चली गयीं. कुछ महीनों में तलाक का नोटिस भी आ गया. लेकिन वो सपना ही क्या जो आपको चैन से सोने दे. जुनूनी मुरुगनाथम् ने लड़कियों से उनके इस्तेमाल किये हुए पैड माँगने शुरू कर दिए. वो उनका कभी खुद परीक्षण करते कभी किसी टेस्टिंग लैब में भेजते. उनकी माँ ने पहले उन पर से भूत-प्रेत उतरवाने के जतन किये और आखिरकार अपनी क़िस्मत ठोंक कर घर छोड़ दिया. गाँव वालों को लगता कि मुरुगनाथम् को कोई गुप्त रोग हो गया है. दोस्त उन्हें देखकर रास्ता बदलने लगे. आखिरकार उन्होंने पता लगा ही लिया कि सेनेटरी पैड बनते तो लकड़ी की लुगदी से ही हैं लेकिन उन्हें बनाने की भारी- भरकम मशीन बहुत महंगी है. मुरुगनाथम् उस मशीन एक छोटी और सस्ती नक़ल बनाने की कोशिश करने लगे.
आज जब मुरुगनाथम् आई.आई.टी और आई.आई.एम. में लेक्चर देते हैं तो कहते हैं, “मैं आपलोगों की तरह पढ़ा-लिखा नहीं था, इसलिए तमाम असफलताओं के बाद भी रुका नहीं. पढ़ा- लिखा होता तो कब का रुक जाता.उनका ये कथन सबसे करारी चोट करता है. पढ़- लिख कर हम सबने एक जैसी डिग्रियां पायीं और अपनी मौलिकता खो दी. स्थाई नौकरी पाने की जद्दोजहद, कुछ नया कर दिखाने के जूनून पर हावी हो गयी. ये हमारे अभिजात्य की हार है जिसकी ठसक में हमने मुरुगनाथम् जैसों को हमेशा हेय समझा है.  

अंततः वो मशीन बन गयी. कम लागत में बढ़िया गुणवत्ता के सेनेटरी नैपकिन बनाने का तरीका मिल गया. उस देश में जहां सेनेटरी नैपकिन की पहुँच शहरी इलाकों में सात प्रतिशत और ग्रामीण इलाकों में सिर्फ दो प्रतिशत है, वहां ये तकनीक मुरुगनाथम् के लिए सोने की चिड़िया साबित हो सकती थी. लेकिन उन्होंने न सिर्फ इसे पेटेंट कराने से मना कर दिया बल्कि ये मशीनें ग्रामीण महिलाओं को मुफ्त में इस्तेमाल करने को दे दी. उनका लक्ष्य इसके ज़रिये ग्रामीण महिलाओं के लिए ज्यादा से ज्यादा रोज़गार और स्वास्थ्यकर ज़िन्दगी मुहैया कराना है. यहाँ वो हमारे अर्थशास्त्र को हराते हैं जो सिर्फ मांग-आपूर्ति और अधिकतम लाभ का रट्टा लगाता है. बस यही एक हार हमें नहीं कचोटती.
आज सैकड़ों गाँव और कई देशों में मुरुगनाथम् की तकनीक और उनके नाम की धाक पहुँच चुकी है. उनके जीवन पर मेंसट्रूअल मैननामक एक डॉक्यूमेंट्री भी बन चुकी है. आई.आई.टी से सर्वश्रेष्ठ आविष्कारसमेत कई राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार उन्हें मिल चुके हैं. लेकिन मुरुगनाथम् को अभी भी चैन नहीं मिला है. वे वर्ष २०३० तक इस तकनीक को भारत के गाँव-गाँव तक पहुंचाना चाहते है. तभी उनकी रजोनिवृतिहो पायेगी. इसे उन्होंने भारत की सेनेटरी पैड क्रान्तिका नाम दिया है. भारत की कुछ जनजातियों में तरुण कन्या के पहले मासिक-स्राव पर पर्व मनाया जाता है. क्योंकि अब वो प्रजनन करने लायक हो गयी है और वंशवृद्धि कर सकती है. इसी तरह मुरुगनाथम् के मासिक धर्म के फलदायी होने का एक उत्सव हम सबको मनाना चाहिए. इसी बहाने कम से कम एक प्रतिबंधित विषय पर बात तो हो सकेगी.

और चूंकि हम सबको सुखान्त पसंद है, इसलिए बता दूं कि अरुणाचलम् मुरुगनाथम् की पत्नी और माँ उनके पास वापस आ चुकी हैं! 


Monday, October 14, 2013

क्यूंकि हमें स्त्रियों की ज्यादा चिंता है!



जनसत्ता में यह लेख
इमेज- जनसत्ता ई पेपर से साभार
पिछले दिनों जनसत्ता में वरिष्ठ लेखक-पत्रकार राजकिशोर जी का लेख प्रकाशित हुआ. लेख वैसे तो सोशल मीडिया के बारे में है जिस पर बहुत कुछ लिखने और समझने को है, पर ना जाने कैसे ये सिर्फ स्त्रियों पर केन्द्रित होकर रह गया.  इसमें उन्होंने ‘कर सकते हैं’ में ‘कर सकती हैं’ को शामिल बताया है और ‘स्त्री’ में ‘स्त्रीवादियों’ को. और पूरा लेख इसी अतार्किक अवधारणा का प्रतिबिम्ब है. इस लेख से मुझे कुछ सैद्धांतिक असहमतियां हैं और कुछ सवाल भी, जिन्हें यहाँ लिख रहीं हूँ-
पहला सवाल तो ये कि अगर समाज में ही ‘फेस’ को ‘बुक’ से ज्यादा महत्त्व मिलता है तो ‘फेसबुक’ उसे उलट कैसे देगा, जैसा कि राजकिशोर जी कि उम्मीद है? और दूसरा यह कि, तकनीक का सदुपयोग करने और अपनी बौद्धिकता साबित करने की सारी जिम्मेदारी स्त्रियों पर ही क्यूँ हो?
तकनीक हो या तंबाकू, मोबाइल फ़ोन हो या फेसबुक. इनके उपयोग- दुरुपयोग की चिंता अगर हमें है तो लड़कियों के लिए ये चिंता हमारी दुगुनी हो जाती है. कोई भी नयी वस्तु या परम्परा समाज में स्त्रियों के लिए देर से ही स्वीकृत होती है. हमारे छोटे शहरों में शायद ही लड़के अपनी रोजमर्रा की जिन्दगी में भारतीय वेशभूषा में दिखें लेकिन लड़की का जींस पहन लेना उसे ‘बुरी’ लड़कियों की श्रेणी में शामिल करने के लिए काफी है. नयी बातों, विचारों और तकनीक के प्रति हमारी पहली  स्वाभाविक प्रतिक्रया अक्सर शंका और प्रतिरोध की ही होती है. लेकिन लड़कियों का जीवन और शरीर हमारे रीति-रिवाजों के रक्षण-संरक्षण का सबसे उपयुक्त स्थल है. इसलिए किसी भी बदलाव का उन तक पहुँचने का रास्ता ज्यादा दुर्गम है. यही बात नयी तकनीकों पर भी लागू होती है.
पहले तो हम ये समझते हैं कि किसी तकनीक को इस्तेमाल करने की लियाक़त औरतों में है ही नहीं. औरतों को बुरा ड्राइवर और खराब टेक्नीशियन बताने वाले चुटकुलों की हमारे पास भरमार है. अगर कभी ये मशीनें उनके हाथ लग भी गयीं तो उनकी हर हरकत को सूक्ष्मदर्शी से देखा जाएगा. किसी आदमी के द्वारा कार दुर्घटना हो जाने पर आप ये नहीं कहेंगे कि आदमी बुरे ड्राइवर होते हैं. लेकिन कोई कार चलाती महिला अगर गलत दिशा में मोड़ ले तो हम सब यही कहेंगे कि ‘औरतें ऐसे ही चलातीं हैं.” खाप पंचायत आये दिन लड़कियों के मोबाइल रखने पर प्रतिबन्ध लगाने जैसे ऊट-पटांग फरमान जारी करती रहती है. सवाल ये है कि अगर लडकियां और लड़के एक दूसरे से बात करके मोबाइल का दुरुपयोग कर रहें हैं तो प्रतिबन्ध एकतरफा क्यूँ हो?
भारत के आम लोगों की जिन्दगी में सोशल मीडिया की दस्तक ज्यादा पुरानी नहीं है. इसकी उपादेयता और नुकसान के बहुत से आयामों पर बहस होनी अभी बाकी है. औरतों की श्रृंगारप्रियता और फेसबुक पर इसके दिखावे को लेकर राजकिशोर जी ने सवाल तो उठा दिया पर उसे सामाजिक सन्दर्भ में देखने की कोशिश नहीं की. हम सब को समाज से लिखी- लिखाई पटकथा मिलती है. उनसे अनुसार व्यवहार करने के लिए प्रशंसा मिलती है और वैसा न किया तो सज़ा भी. लड़कियां लड़कों के मुक़ाबले आसानी से रो देती हैं क्यूंकि उनका ऐसा करना सामान्य माना जाएगा जबकि लड़के ऐसा नहीं कर सकते क्यूंकि उन्हें पता है कि इससे उनका मजाक बनेगा. यही बात फेसबुक पर अपनी अलग-अलग पोज़ में फ़ोटो डालने पर भी लागू होती है. सोशल मीडिया में हर व्यक्ति अपनी सामाजिक समझ और ट्रेनिंग के साथ आता है. जो जैसा समाज में है कमोबेश वैसा ही अपने फेसबुक या ट्विटर खातों पर भी व्यवहार करेगा. पहले जो लोग आपको भगवान को न मानने पर पाप लगने से डराते थे वो ही अब फेसबुक पर भगवान की फोटो साझा या लाइक न करने पर कुछ बुरा होने की वर्चुअल धमकियां देते दिख जाते हैं. ऐसे में लड़के और लड़कियों के व्यवहार में भी विभिन्नता दिखे तो हैरानी की बात नहीं है. दोनों का समाजीकरण और ट्रेनिंग समाज में अलग तरह से होती है. लेकिन एक को दूसरे से बेहतर क्यूं माना जाय? लड़कियों पर ये साबित करने का अतिरिक्त भार क्यूँ हो कि वो तकनीक का सदुपयोग ही करेंगी? जितनी विभिन्नता लड़के और लड़कियों में है, उससे कहीं ज्यादा अंतर लड़की-लड़कियों और लड़कों-लड़कों में आपस में है. न हर, लड़की हर घंटे अपनी फोटो बदलने में मशगूल है और न ही हर लड़का बौद्धिक बहस करके सोशल मीडिया के ज़रिये देश का उत्थान कर रहा है. दरअसल, कोई भी व्यक्ति हर वक्त तार्किक नहीं होता. वैसे भी फ़ोटो बदलने की दर का किसी के बुद्धिमान या बुद्धिहीन होने से क्या लेना-देना है? समाज पूरी तरह से नहीं बदला है इसलिए सारी स्त्रियाँ भी नहीं बदलीं है. ज्यादा नहीं तो रविवार को अखबारों के वैवाहिक विज्ञापन पलट डालिए, कितने लोग अपने पुत्र के लिए बौद्धिक कन्या की मांग करते हैं? लड़कियों की ख़ूबसूरती को हमेशा से समाज में उनके अन्य गुणों से ज्यादा महत्त्व दिया जाता रहा है, सोशल मीडिया उसका एक प्रतिबिम्ब मात्र है. दरअसल राजकिशोर जी ने स्त्री और स्त्रीवादी को एक ही शब्द मान लिया है और इसी वजह से ऐसी अतार्किक बात लिखी है. न हर एक स्त्री, स्त्रीवादी है और न ही स्त्रीवाद की समर्थक सिर्फ स्त्रियाँ हैं.
देश के अधिकाँश हिस्सों में सोशल मीडिया का पहुँचना अभी बाकी है. लेकिन कम से कम जिन लोगों तक इसकी पहुँच है, अभिव्यक्ति के माध्यमों में शायद सोशल मीडिया ही एक ऐसा है जहाँ अपनी बात कहने-लिखने के लिए आपको किसी का मुंह नहीं ताकना है. प्रकाशित या लोकप्रिय होने की चिंता नहीं करनी है. ऐसे में इसे बस एक माध्यम ही रहने दिया जाय तो अच्छा है. क्योंकि बौद्धिक होने या दिखने की अनिवार्यता के साथ ही उसमें एलीटिस्ट (उच्चवर्गवादी) हो जाने का ख़तरा है. और साथ ही एक सवाल भी कि, बौद्धिक होने की कसौटी क्या है और इसे निर्धारित कौन करेगा?

वैसे भी, अगर हम शुरू से ही लड़कियों को हर लिहाज से कमतर समझते आये हैं तो एक भी ऐसा उदाहरण हमारी विचारधारा की पुष्टि करने के लिए काफ़ी है और उसके विरोध में उपस्थित सैकड़ों प्रमाण भी हमारे लिए अदृश्य ही रहेंगे. अपनी फ़ोटो बदलते रहने वाली लड़कियां तो दिखेंगी लेकिन हनी सिंह के वीडियो और बेकार के चुटकुलों को शेयर करने वाले लड़के नहीं दिखेंगे. क्यूंकि अंततः हम वही देखते हैं जो हम देखना चाहते हैं!

यह लेख जनसत्ता के सम्पादकीय में प्रकाशित है- 
http://www.jansatta.com/index.php/component/content/article/53607-2013-10-28-04-14-19)

Tuesday, September 17, 2013

हर समस्या का समाधान फांसी है?


१६ दिसंबर की घटना की कालिख जो हमने कभी दिल्ली, कभी दिल्ली पुलिस तो कभी हनी सिंह जैसों के ऊपर पोतने की कोशिश की थी, जो थोड़ी-थोड़ी हम सब के चेहरों पर पुतनी चाहिए थी, वो फांसी के जश्न में स्वाहा हो गयी. और हम सब ने चैन की सांस ली कि अब सब कुछ बदल जाएगा. ड्राइंग रूम की चमेली पहले जितनी ही चिकनी रहेगी, भाई (छोटा वाला भी) पहली जितना ही प्रोटेक्टिवरहेगा जो कभी भी गेट पर ज्यादा देर खड़े होने के लिए बहन को डांट देगा, हमारी माँ का नाम अब भी घर के दरवाज़े पर नहीं होगा, लेकिन दुनिया फिर भी स्वर्ग होगी क्योंकि रेयरेस्ट ऑफ रेयरअपराधी जहन्नुम के रास्ते पर हैं.
मानवाधिकार की गुहार फिलहाल किसी को हजम नहीं होगी, आजकल बयार ही ऐसी है. उसकी बात नहीं करते. लेकिन आंकड़ों की माने तो अमेरिका के जिन राज्यों में फांसी का प्रावधान है उनमें अपराध दर उन राज्यों के मुक़ाबले कहीं अधिक है जहां इस सज़ा का प्रावधान ख़त्म किया जा चुका है. दरअसल इक्का-दुक्का मामलों में फांसी नहीं बल्कि हर मामले में सुनिश्चित सज़ा का डर ही अपराध को रोक सकता है. एक बात और भी है, सज़ा जितनी कड़ी हो कोई भी न्यायाधीश या न्यायपीठ उस सज़ा को देने से बचना चाहता/चाहती है. ऐसे में बलात्कार की सज़ा फांसी होने से सज़ा होने की दर कम ही हो जायेगी जो वांछनीय नहीं है.
लेकिन इस सज़ा का असल हक़दार है कौन? अगर मान लें कि उस रात की घटना एक नाटक थी, तो उसमें शामिल वो छः आदमी तारीफ़ के पात्र हैं. उन्होंने पुरुषनामक पात्र को बिल्कुल हमारी भावनाओं के अनुरूप जिया. कोई भावनात्मक कमजोरी नहीं, कोई डर नहीं, सिर्फ और सिर्फ पाशविक बल. वो लड़की बहुत बुरी ऐक्ट्रेस थी और उस नाटक की कमजोरी भी, जो न सिर्फ गलत समय और जगह पर स्टेज पर आयी बल्कि दया की भीख मांगने वाला डायलॉग भी भूल गयी. तभी तो हमें उसका देश की बेटीके रूप में दोबारा नामकरण करना पड़ा ताकि वो हमारे समाज में अच्छीलड़कियों के लिए स्थापित चुनिन्दा श्रेणियों फिट बैठ सके और हम उसके लिए दुःख जैसा कुछ महसूस कर पायें. लड़कियों को इंसान से कमतर और लड़कों को इंसान से बद्तर बनाने की इस प्रक्रिया में हमारी बरसों की मेहनत लगी है. ये कुछ महीनों के प्रोटेस्ट मार्च से नहीं जाएगी. लैंगिक असमानता बलात्कार की देन नहीं, बलात्कार इस असमानता की एक हिंसक अभिव्यक्ति मात्र है.
एक परुष मित्र ने इस घटना के बाद मुझसे बड़ी तक़लीफ भरी आवाज में पूछा, ‘मैं भी लड़का हूँ, क्या मैं भी किसी दूसरे इंसानके साथ ऐसा कर सकता हूँ?’ मैंने जवाब तो नकारात्मक दिया लेकिन फिर सोचा कि हमने लड़कियों को एक स्वतंत्र इंसान का दर्जा दिया ही कब है? वो किसी साथी इंसान के साथ ऐसा नहीं कर सकता लेकिन किसी चीज’  के साथ ज़रूर कर सकेगा. लड़कियों को वस्तु बनाने की चेतन/अचेतन और सुनियोजित प्रक्रिया में हमने भाषा, धर्म, बाजार, संस्कृति हर चीज का सहारा लिया है. अब ये असमानता हमारे दैनिक जीवन में इतना रच-बस गयी है कि उसका विरोध कर पाना नामुमक़िन सा है. आपसे पूछा जाय कि आप अपनी माँ को ही तुम क्यूँ कहते हैं?’ तो आप कहेंगे कि ये तो मेरा प्यार है’, चीयर गर्ल्स को घूरने से रोका तो आप कहेंगे कि इससे कुछ नहीं होता’, ‘कन्यादानजैसे शब्दों पर सवाल उठाया तो आप कहेंगे ये तो रस्म है’. ये हम हर दिन सुनते हैं, ‘एक फिल्म ही तो है’, ‘एक चुटकुला ही तो है’, ‘एक विज्ञापन ही तो है’. हम किसी हिंसक बलात्कार का विरोध कर सकते हैं, लेकिन अपने मनोविज्ञान की तहों में हम सब (लड़कियां भी) सेक्सिस्टहैं. ज्यादा दूर क्यूँ जाएँ इसी प्रोटेस्ट मार्च में शामिल एक पोस्टर पर नज़र डालिए- ‘If you can’t protect us, kill us in the womb.’ (अगर आप हमें सुरक्षित नहीं रख सकते तो हमें कोख में ही मार दीजिये’). मतलब अगर लड़की पैदा की तो ताउम्र उसे सुरक्षित रखने का झंझट पालिए. हमारे इरादे तो नेक हैं लेकिन फिर भी हम अपनी अभिव्यक्तियों को नहीं बदल पा रहे हैं. दरअसल, हम सब उसी मिट्टी के बने हैं जिसे हम किसी बेहतर सांचे में ढालने की कोशिश कर रहें हैं. इन तत्वों ने ही हमें बुना है और इसके साथ हम बड़े हुए हैं. हमारे घर-समाज में ऐसा ही होता आये है इसलिए इनकी बुराइयाँ गिनवाने वाले को छिद्रान्वेषी या 'अति-प्रतिक्रियावादी' होने का तमगा मिलना ही है.
१६ दिसंबर की घटना के बाद की अपाधापी में वेश्यावृत्ति से लेकर, अश्लील गानों और विवाह के अन्दर रेप तक पर चर्चा हुई. कुछ काम की बातें हुईं कुछ में सनसनी ज्यादा थी. लेकिन कम से कम हमने इस बात को पहचानना तो शुरू किया था कि अपने घरों में हमने जो सामाजीकरण की फैक्ट्रियां लगाईं हैं उनका उत्पाद कुछ गड़बड़ है. लेकिन इस सजा की सुनवाई के साथ ही बड़ा घातक आत्मसंतोष हम सब पर हावी होने लगा है. पहले एक अपराधबोध था जो अब हवा हो गया है. जनाक्रोश को बस एक बलि का बकरा चाहिये था जो मिल गया. सबने मान लिया है कि हल निकल गया है और अब किसी क्रान्ति की न तो फुर्सत है ना ही जरूरत लगती है.
हर हिंसा में खून नहीं बहता, हर असमानता इतनी आसानी से नजर नहीं आती. असमानता की जो घुट्टी बचपन से पी और पिलाई है उसका हल सिर्फ़ कड़े कानून और फांसी के फंदे से नहीं निकलेगा. चूंकि ख़ुद को बदलने में कष्ट होगा इसलिए दिल्ली, मुंबई या पाश्चात्य सभ्यता पर इल्जाम थोपना और अपराधियों को मृत्युदंड पर चैन की सांस लेना, आसानी से बच निकलने का रास्ता भर है. इन बातों को हम समय रहते समझ लें तो अच्छा है. समाज को बर्बर बनाएं या मृत्युदंड ख़त्म कर दें, लिंगभेदी बने रहें या बदलने का कष्ट उठायें, इसका निर्णय हमें ही करना है क्यूंकि यहाँ हमें ही रहना है!


Thursday, August 15, 2013

निक़ाबी निन्जा और बुर्के की बहस


आपकी आधुनिकता का परिचय आपके ख़यालात देते हैं या कपड़े? जिस तालिबान को अमेरिकी सेना से डर नहीं लगता वो पंद्रह-एक साल की उस लड़की से क्यूँ घबराता है जिसके हाथों में किताब है? हमें देसी कपड़ों में सजे-धजे लोग पिछड़े क्यूँ नज़र आते हैं? औरतों पर कुछ ख़ास ड्रेस-कोड थोपना बुरा है लेकिन क्या जबरदस्ती उघड़वा देना इसका हल है?
और बुर्के की तो बात ही न कीजिये. हर कोई मुस्लिम औरतों को आधुनिकता की रोशनी दिखाना चाहता है. फ़्रांस की सरकार हो या पश्चिमी साम्राज्यवाद, नारीवादी हों या सेक्युलरिस्ट, सबको बुर्काधारिणियों पर तरस आता है. ऐसे में पाकिस्तान में बनी एक कार्टून फिल्म और वीडियो गेम बुर्का अवेंजर ने आधुनिकता बनाम बुर्के पर बहस छेड़ दी है. इसकी हिरोइन एक स्कूल टीचर 'जिया' है जो दिन में लड़कियों को पढ़ाती है और रात में बुर्के में अपनी पहचान छुपा कर कठमुल्लों से लड़ती है जो लड़कियों के स्कूल बंद कराने पर आमादा हैं. उसकी कलम सचमुच तलवार से भी ज्यादा ताकतवर है, कराटे-कला और किताबें उसका हथियार हैं. अपने लहराते बुर्के की मदद से पेड़ों-छतों पे छलांग लगाती है. उसकी तुलना मलाला से हो रही है जिन्होंने अपनी क़िताब और कलम के बल पर रूढ़िवादियों को कुछ ऐसे ही छकाया था. लोग हैरान भी हैं कि दमन का प्रतीक बुर्का किसी आधुनिक सुपर हिरोइन पर कैसे जंच सकता है?  
दरअसल, आधुनिकता की बात हम ऐसे करते हैं मानो वो कोई इकहरा चोला हो, कुछ ख़ास तरह की चाल- ढाल और कपड़े-व्यवहार अपना लिए और बस मॉडर्नहो गए. बात महज ऊपरी रंगत से कहीं गहरी है. मैं बुर्के की हिमायती नहीं हूँ. स्वेच्छा (?) से बुर्का अपनाने वाली कई महिलाओं का कहना है बुरका उन्हें सुरक्षा और आत्मविश्वास देता है. अपनी सुरक्षा के लिए महिलाओं को अपनी पहचान छुपाने के लिए मजबूर करने वाला समाज निश्चय ही आधुनिक नहीं है. आधुनिकीकरण, सशक्तीकरण, महिला स्वतन्त्रता, इन सबकी परत-दर-परतें हैं. सामाजिक मानदंडों को धता-बता कर अपनी मर्जी के कपड़े- व्यवहार- आदतें अपनाने वाली लड़कियां तो मॉडर्न हैं हीं, लेकिन सर ढककर लड़कियों की शिक्षा की हिमायत करने वाली मलाला उन बिकनीधारिणियों से कहीं ज्यादा आज़ादख़याल है जो दुनिया की नज़र में सुन्दर बने रहने के लिए बिना खाए अधमरी हो रहीं हैं. अगर किसी लड़की को बिना कठमुल्लों का शिकार बने शरीर दिखाने का अधिकार है तो उसे फैशन और आधुनिकता के मानदंडों की परवाह किये बिना अपना शरीर ढकने का भी उतना ही अधिकार होना चाहिए. इस बात का ध्यान रखना होगा कि आधुनिकता के नाम पे हम कहीं किसी ख़ास तरह की संस्कृति और वेश-भूषा को तो बढ़ावा नहीं दे रहे? परदे की जगह सेक्चुअल ओब्जेक्टीफिकेशनको बैठा कर हम कुछ नहीं पायेंगे. आधुनिकता का मतलब ऐसा समाज बनाने से है जहां औरतें अपनी मर्ज़ी से पढ़ और पहन सकें. 
मध्य-पूर्वी और इस्लामी देशों की औरतों की चिंता में दुबले होते हुए हम ये भूल जाते हैं कि असल विद्रोह उनके अन्दर से ही पैदा हो रहा है. दमित ही दमनकारियों के खिलाफ़ उठ खड़े होते हैं. मलाला वहीं पैदा होती है जहां उसे गोली मारने वाले हैं. अमेरिका इन देशों में जितनी भी दखलंदाज़ी करे, खुद फूटी क्रांती ही कोई स्थाई परिवर्तन ला पाती है. इसलिए इन औरतों को आधुनिकता की अपनी परिभाषा और मानक खुद गढ़ने दीजिये. अपने बुर्के-बंधन काटकर कर ख़ुद निकलने दीजिये.
इस कार्टून फिल्म को, बुर्के को युवतियों के बीच कूलका दर्जा दिलाने की साजिश बताने वाले ये भूल जाते हैं कि 'बुरका अवेंजर' उर्फ़ स्कूल टीचर जियाअपनी रोज़मर्रा की जिन्दगी में बुर्का नहीं पहनती. ऐसा वो सिर्फ गुंडों से लड़ते वक्त अपनी पहचान छुपाने के लिए करती है. काल्पनिक सुपरहीरो हमेशा से अपनी पहचान छुपाते रहे हैं. अपने देशकाल और सन्दर्भ को ध्यान में रखते हुए पाकिस्तानी सुपरहिरोइन ने मास्क की जगह बुर्का इस्तेमाल कर लिया तो इसमें बुरा क्या है?
बरसों से डिज्नी लड़कियों को परियों और नाजुक राजकुमारियों की कहानी सुना रहा है, उन्हें सिंड्रेला और मरियल बार्बी जैसे फिगर पाने के सपने दिखा रहा है और दुनिया को बचाने की ज़िम्मेदारी बैटमैनऔर सुपरमैनने ले रखी है. ऐसे में उन्हें अगर किताब-क़लम के बल पर बाबा बन्दूकसे लोहा लेने वाली सुपरहिरोइन मिल गयी है तो अच्छा ही है ना? इंग्लिश वीडियो गेम्स में औरतें कटे- कुतरे कपड़ों में सिर्फ गेम का ग्लैमर बढाती हैं. जब पश्चिमी 'कैटवुमन' या 'वंडरवुमन' परदे पे आती भी हैं तो कटे-फटे और तंग रेक्सीन सूटों में जो उन्हें ताकतवर से ज्यादा उत्तेजक दिखाते हैं. ऐसे में अपनी निक़ाबी निन्जा को देखना अच्छा लगता है, बिना ये जाने की उसकी कमर कितनी पतली है और फिगर कितना संतुलित है!  

ये लेख जनसत्ता में प्रकाशित  है- http://epaper.jansatta.com/151320/Jansatta.com/24-August-2013#page/6/1 


Sunday, June 30, 2013

चम्पकवन, ट्रेन और बारामूडा ट्रायेंगल


उन दोनों को ट्रेन में खिड़की वाली सीट पर बैठना हमेशा से पसंद था. उल्टी दिशा में भागते खेत-पेड़ जब चलती रेलगाड़ी के पेट में समाते जाते तो तेज हवा में आँखे मिचमिचाते बाहर देखते लाजवंती और वीर किसी और ही दुनिया में चले जाते थे. बादलों में आकार बन जाते, आस-पास के लोग और आवाजें खो जातीं और वो छूने की दुनिया छोड़कर सोचने की दुनिया में चले जाते. हर दो स्टेशन के बीच फैले खेत-जंगल देखकर वो सारी कहानियाँ सजीव हो उठतीं जिनमें बच्चे अपनी नानी से मिलने जंगल पार करके जाते थे और भालू या शेर को चकमा देकर नानी के घर ठाठ से खीर खाते थे. चम्पकवन के राजा शेर सिंह ने इन्हीं जंगलों में अपना दरबार लगाया होगा. भालू का नाम भोला, बाघ का नाम बघीरा और हर गिलहरी चीकू होती होगी. खेत में पंछी भगाते किसानों को देखकर उन्हें रंज होता कि वो भी इनके जैसी ही झोपड़ियों में क्यों नहीं रहते. ज्य़ादा दिल दरिया हो रहा हो तो खिड़की के पास बैठने का समय आधा- आधा बाँटा भी जा सकता था.
लेकिन आज की ट्रेन का सफ़र कुछ अलग है. जिस शहर जाना है वो उनके सपनों के आकार का कटा-बुना है. वहां पैकेट वाला दूध हर गली- दूकान पर मिलता है और पॉपकॉर्न बहुत महँगा है. चलते वक्त किसी लाजवंती के घरवालों के कान में मंतर फूंक दिया था कि हॉस्टल का माहौल लड़कियों को बिगाड़ देता है, वहां हर तरह की लड़कियां हर तरह की बातें करतीं हैं. वीर के घर छोड़ते वक्त उसके घरवालों ने उसे तिलक किया, नज़र उतारी कि वो इंजीनियर बन के ही लौटे.
ट्रेन के बाथरूम अच्छे तो कभी भी नहीं लगते पर उस दिन और भी घिनौने लगे. उससे पहले उनकी ऊंचाई कम थी और वो हिलते बाथरूमों में सधे हाथों से जाने किन इरादों से लिखे वैसे वाले वाक्य नहीं पढ़ सकते थे. वैसे वाले वाक्य जो सबको पता है वहां लिखे मिलेंगे लेकिन जिसके बारे में कोई किसी को सावधान नहीं करता, जिसका दरियादिल पेंटर कभी अपने काम का क्रेडिट नहीं लेता, जो पढ़कर आप अपने कपड़े वापस चढ़ाते हैं, हाथ धोकर अपनी सीट पर वापस आकर सह-सीट-वासी से देश की गंभीर समस्याओं के बारे में बात चालू कर देते हैं. लेकिन अब वैसा वाला सचित्र वर्णन उनकी बढ़ती नज़र के दायरे में आने लग गया था. उस पर लिखा था- ‘देख क्या रही है, तू भी करवायेगी क्या?’ जो करवाना था उसका चित्र भी खुरच रखा था. ऐसा लगा कि ये उनकी ज़िन्दगी का सबसे बदसूरत और डरावना चित्र है. उस ट्रेन पे ऐसे चित्रों के रचयिता भी थे और उनके पहले परिचय को ऐसे चित्रों के सहारे छोड़ देने वाले भी. बुराइयों के साथ-साथ नैतिक शास्त्र की किताबों ने भी हम सबको घुस-घुस कर मारा है. स्त्री-पुरुष संबंधों का सौन्दर्यबोध ताउम्र गड़बड़ाया ही रहेगा अब.
ये ट्रेन कभी वापस नहीं लौटती थी. लाजवंती को सीधे उस हॉस्टल उतारा था जिसका नाम उसकी वार्डन के फ़ेवरेट टी वी सीरियल के नाम पर ‘अपराजिता’ था और वार्डन का नाम डॉ. (ब्रैकेट में मिसेज़) सुशीला शर्मा था. यहां की लड़कियां हर रात खाने के ‘वक्त कसौटी जिन्दगी की’ देखती थीं. प्रेरणा के साथ आंसू बहाती, अनुराग बासु से उसकी शादी करवाने के लिए मन्नतें मांगतीं थीं. वो कभी वो नहीं देखतीं थीं जो वीर के हॉस्टल के लड़के देखते थे क्योंकि वैसी फ़िल्में देखने वाली लड़की से वो लड़के कभी शादी नहीं करेंगे. और इन लड़कियों को उन लड़कों के सपने देखने थे, उनसे अपनी आंख का काँटा निकलवाना था और उन्हें ये बताना था कि कल के एपिसोड में जब उन्होंने प्रेरणा को अनुराग बासु के साथ बारिश में डांस करते देखा तो वो समझ गयीं कि वो अच्छी लड़की नहीं है. इन लड़कियों के कुर्तों में जेब नहीं हुआ करती थी और वो कोका-कोला हमेशा स्ट्रॉ से पीती थीं. ये लोग बस दो शेड गोरा करने वाली क्रीम लगा कर क्रिकेट-कमेंटेटर, सिंगर, एयर–होस्टेस कुछ भी बन सकतीं थीं.   
थोड़ा सहेलीपना जम जाने पर सारी लड़कियां रात के खाने के बाद जाली-ग्रिल लगी खिड़कियों से बाहर ताकते बतियाने लगीं थीं. ये वक्त बड़ा खलबली मचा देता था. पास के चराहे पर ट्रैफिक बढ़ जाता, अंडे वाले के स्टाल की बिक्री बढ़ जाती, गले में फटे बांस को पनाह देने वाले भी तानसेन हो जाते, सीटियाँ मारने के गुण की कीमत बढ़ जाती, किसी को अपनी आँख- गर्दन की तकलीफ़ याद नहीं रह जाती और लुंगी वाले अंकल की खुजली बेतहाशा बढ़ जाती थी. सामने के ब्वायज हॉस्टल से लेज़र टॉर्च की लाइटें लड़कियों पर इधर-उधर पड़ने लगतीं. उनमें से एक दबंग टाईप लड़की का दावा था कि अगर हम सड़क पर इनके सामने जाकर खड़े हो जाएँ तो ये लोग पहचान नहीं पायेंगे कि ये वही वाली है जिसे बालकनी में देखने के चक्कर में जनाब ने सर उचकाया था और अपना संतुलन खो बैठे थे. फिलहाल इस दावे को टेस्ट करने जितनी आज़ादी नहीं थी और गिरने वाले, लड़की की आउटलाइन देखकर ही एक्सीडेंट का ख़तरा मोल लेने को तैयार थे. रात की ड्यूटी वाला वाचमैन झपकी-रहित रात बिताने पर मजबूर था. ये वही रात थी जब वीर की झिझक खोली जा रही थी और उसे अजीब आकृतियों वाली लेज़र लाईट से सामने वाले हॉस्टल की लड़कियों पर निशाना साधने को कहा जा रहा था. उसके रूम- मेट ने कुछ ख़ास अंगों के ज्यादा प्वाइंट्स निर्धारित कर रखे थे.
वीर की ट्रेन ने उसे ‘दास- हॉस्टल’ ले जा पटका था. जिसका नाम उस हॉस्टल के फंडदाता के नाम पे रखा गया था. वो अपनी टीचरी के वेतन का एक रुपया रख के बाकी हॉस्टल बनवाने के लिए दान कर देते थे. ‘एक रुपया भी काहे लेता था बे?’... ये था वीर का रूम-मेट जो भदोही के पास के किसी गाँव का था और तीन साल से इंजीनियरिंग एंट्रेंस परीक्षाओं की तैयारी कर रहा था. गाँव में सब यही जानते थे कि वो इंजीनियरिंग पढ़ रहा है. ऐसी अफवाहों के सहारे दहेज की संभावना दूनी- चौगुनी करने की गणित तो उसके इंजीनयरिंग बेपढ़े घरवालों को भी आती थी. वीर को वार्डन के साथ आता देखकर उसने हाथ में ली हुई क़िताब झट से तकिये के नीचे छुपा दी थी. वार्डन ने उससे आके पूछा कि उसकी पढ़ाई कैसी चल रही है. उसने जवाब दिया कि वो इस साल पूरी जान लगा देगा और आई. आई. टी. निकाल कर ही रहेगा.
उस हॉस्टल में एक और संत थे जिनका दावा था कि वो लड़की का फिगर देखकर उसका चरित्र बता सकते थे और उनका अंदाजा सौ में से निन्यान्बे टाइम सही निकलता था. इन्हीं सबों के किसी पूर्वज ने ही बारामूडा ट्रायेंगल नाम दिया था गर्ल्स हॉस्टल को, कि जो एक बार उधर ताका वो फंसा तो बस फंसा. ये लड़के अपना बटुआ पैंट की पीछे वाली जेब में रखते, थे जिसे बिल देने के लिए निकालते वक्त आगे झुकना पड़ता था. ये लोग कभी- कभी वैसी वाली फ़िल्में छोड़कर टी. वी. भी देख लेते थे. एक गाने का वीडियो चल रहा है जिसमें लड़का अपनी छोटे कपड़ों वाली शहरी गर्लफ्रेंड को लेकर गाँव आया है जहाँ उसकी घरेलू मंगेतर उसका पहले से ही इंतज़ार कर रही है. दोनों में उस लड़के को पाने के लिए झगड़ा होता है और अंततः गाँव की सीधी- सादी लड़की जीत जाती है.
लाजवंती और वीर की मुलाक़ात अभी भी हो ही जाती है. लेकिन अब वो पहले की तरह एक दूसरे से ये नहीं पूछते कि शाम को खेलने आना है या नहीं. दोनों एक दूसरे का हाल चाल पूछ लेते हैं पर ना तो लाजवंती वीर को बताती है कि सुबह पेपरवाला उसके बगल से कानों में क्या बोलता हुआ निकलता है और ना ही ये कि रात को वो लुंगी वाले अंकल जी उसके हॉस्टल की बालकनी के सामने कुछ करते नज़र आते हैं और बारामूडा ट्रायेंगल के पास होकर भी उनका निशाना कभी नहीं चूकता. वीर भी उसे ये नहीं बताता कि अपनी झिझक खोलने के लिए वो क्या-क्या देख पढ़ रहा है और सब लड़कों के साथ वो भी हँसता है जब उस लुंगी वाले के आते ही लड़कियां अन्दर भागने लगतीं हैं.
दोनों के बीच एक दीवार है जो प्यार की संभावनाओं, बड़े-बूढों की सीखों, अफ़वाहों- उठती भौहों- इशारों और मोहनीश बहल के फेमस वाले डायलॉग की बनी है. एक दीवार जो उम्रो-उम्र से इसी उम्र के आस-पास आ खड़ी होती है. एक दीवार जिस पर चढ़ कर उनकी पुरानी ‘बच्चे-दोस्त’ वाली दोस्ती झाँकने लगती है; जब मासी की सिंगापुर से भेजी टॉफियाँ उनका सबसे कीमती खज़ाना थी और नोंक बदलने वाली पेंसिल दुनिया का सबसे महान आविष्कार; और दोनों उदास हो जाते हैं.
फिलहाल ‘अपराजिता’ की वार्डन डॉ. (ब्रैकेट में मिसेज़) सुशीला शर्मा का सख्त आदेश है कि लड़कियों को बालकनी पे खड़े होना ही है तो वहाँ थोड़े- बहुत कपड़े डाल दें और बालकनी की लाईट हमेशा बंद रहनी चाहिए. नीचे एक नया ऑटो वाला ‘दिल तो पागल है’ के गानों की तर्ज पर सीटियाँ बजाये जा रहा है......

(इससे पहले- 
छठवीं क्लास के सेक्शन ए से लाजवंती और सेक्शन बी से वीर

Sunday, June 16, 2013

पुरुष होने के लिए.....


जेंडर स्टडीज़ की क्लास का पहला दिन था. जैसा कि होता आया है लड़के गिने- चुने ही थे. सबसे पूछा गया कि आपने ये कोर्स क्यों लिया? लड़कियां बढ़- चढ़ कर जवाब दे रही थीं. किसी की रूचि अकादमिक थी तो कोई अपनी व्यक्तिगत समस्याएं गिना रही था. लड़कों की बारी आई तो ज्यादातर का यही जवाब था- ‘मैं जानना चाहता हूँ कि हमारे देश में लड़कियों की स्थिति इतनी बुरी क्यूं है?’ ये भावना क़ाबिल-ए-तारीफ़ है लेकिन एक सवाल भी उठाती है- क्या जेंडर शब्द सिर्फ लड़कियों के लिए बना है? क्या लड़के कभी ये महसूस करते भी हैं कि जेंडर उनकी जिन्दगी के हर क्षेत्र में घुसपैठिया है? हर देश- राज्य, हर यूनिवर्सिटी में जेंडर से सम्बंधित विषयों में लड़कों की संख्या इनी- गिनी ही है. कुछ हद तक ये समझा जा सकता है कि अमेरिकी विश्विद्यालयों के अमेरिकन- अफ्रीकन अध्ययन विभागों में अश्वेत लोगों की संख्या ज्यादा क्यूँ है या फिर अपने देश में ज़ामिया यूनिवर्सिटी का जो नार्थ- ईस्ट रिसर्च सेंटर है जहां ज्यादातर प्रोफ़ेसर- शोधकर्ता देश के उत्तर-पूर्वी राज्यों से ही क्यूं हैं. कभी-कभी किसी क्षेत्र, नस्ल या मुद्दे से आपकी क़रीबी आपकी अकादमिक रूचि भी बन जाती है. लेकिन जेंडर की घुसपैठ तो सिर्फ लड़कियों की जिन्दगी तक ही सीमित नहीं फिर जेंडर स्टडीज़ होम साइंस की तरह ही लड़कियों का विषय कैसे बन गया? क्या लैंगिक असमानता की वजह से लड़के कोई भेद- भाव महसूस करते हैं? लेकिन उससे भी पहले एक सवाल- क्या लैंगिक असमानता लड़कों पर भी कोई प्रभाव डालती है? 
हर उस औरत के लिए जो घर के काम- काज करने पर मजबूर है, एक आदमी है जिस पर घर भर के लिए कमाने और स्थाई नौकरी पाने का दबाव है. हर ‘अबला’ जो अपनी सुरक्षा खुद नहीं कर सकती उसकी रक्षा के लिए एक लड़के को ‘मर्द’ बनना है. हमारी फ़िल्में, शेविंग क्रीम और चड्ढी- बनियान के ऐड सिर्फ लड़कियों की ख़ूबसूरती ही नहीं, मर्द की ‘मर्दानगी’ के भी मानक गढ़ते रहें हैं. हिरोइन किसी भी कोने-गढ़े में सौ- पचास गुंडों से घिर कर मदद के लिए पुकारे, हीरो को आना ही है और सारे गुंडों को अकेले हराना ही है. ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ में एक सीन है, गोलाबारी हो चुकी है और खतरा मंडरा रहा है, ऐसे में एक मर्द कहता है- ‘लेडीज़ लोग अन्दर जाइए, चलिए.’ ये एक फ़िल्म की नहीं पूरे समाज की कहानी है. पुरुष को चाहे-अनचाहे माँ, बहनों का रक्षक, घर का शासक- अनुशासक बनना ही है. प्यार में पहल उन्हें ही करनी है. लड़की के हँसी- इशारों को समझने में देर नहीं करनी है. डेट पर गए तो लडकी के लिए दरवाज़ा खोलना है,  कुर्सी खींचनी है और बिल न देने का तो कोई सवाल ही नहीं है.  लिंगभेद से उपजे बंटवारे की सबसे ऊंची पायदानों पर ज्यादातर पुरुष हैं, लेकिन सबसे निचली पायदान पर भी वो ही हैं. डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक का नाम लेते ही हमारे दिमाग में सबसे पहले पुरुष की छवि कौंधती है लेकिन चोर, लुटेरे और सटोरिये जैसे शब्द भी पुरुषों के लिए ही बने लगते हैं. हर कोई मर्द के बजाय महिलाओं पर ज्यादा जल्दी भरोसा कर लेता है और उनकी मदद के लिए झट से तैयार हो जाता है. सबसे ख़तरनाक कामों के लिए भी हम पुरुषों को ही आगे करते हैं. रात- बेरात बिजली के टूटे तारों की मरम्मत उन्हें ही करनी है, युद्ध पर भी उन्हें ही जाना है. आकड़ों की मानें तो ‘ऑन ड्यूटी डेथ’ में पुरुषों की संख्या महिलाओं से कहीं अधिक है. 
हरेक सभ्यता ने अपने विकास के दौरान स्त्री और पुरुष दोनों का इस्तेमाल किया है. अब सवाल ये है कि सिर्फ लड़कियां ही अपने जीवन में इस शोषण की मौजूदगी क्यूँ महसूस करतीं हैं, लड़कों को ये दबाव क्यों नहीं पता चलता? इसकी वजह ये है कि मर्दानगी से जुड़ी हर एक चीज़ का स्थान समाज में ‘नारीत्व’ से जुड़ी हर एक चीज़ से ऊंचा है. घर में ‘ब्रेडविनर’ का दर्जा ‘हाऊसवाइफ’ से अव्वल है. आक्रामक होना बहादुरी है और रोना कमज़ोरी है. युद्ध में खून बहाना बहादुरी है और मासिक चक्र में खून बहना अशुद्धी और कमज़ोरी की निशानी है. लड़की का कमाना, मर्दाने कपड़े पहनना और बाहर के काम करना बहादुरी है लेकिन लड़के के लिए लड़कियों वाले काम करना अपना मज़ाक बनवाना है. कभी सोच कर देखिये कि हिजड़े हमेशा औरतों जैसे ही कपड़े क्यूं पहनते हैं? दरअसल इस विभाजन में लड़का- लड़की विपरीत होकर एक दूसरे के आमने सामने नहीं ऊपर-नीचे का दर्जा पा चुके है. एक फेमिनिस्ट लेखक ने कहीं कहा था कि- ‘बेटी को तो कोई भी बेटे की तरह पाल सकता है लेकिन अपने बेटे को बेटी की तरह पालने के लिए हिम्मत चाहिए.’ मर्दानगी और इससे जुड़े गुण समाज के लिए मानक (स्टैण्डर्ड) हैं बाकी सब कमतर है. इसलिए बेटे को बेटी जैसा सम्वेदनशील नहीं बनाया जा सकता. हर क्षेत्र के प्रशंसित और सफल लोगों में, घर में ज्यादा खाना पाने वालों में, बहन के मुकाबले पढ़ाई के लिए ज्यादा बजट पाने वालों में, पुरुष जहाँ देखते हैं वहां वो ही वो हैं. इसलिए ये असमानता उन्हें नहीं कोंचती. ऐसा लगता है कि जेंडर ने पुरुषों का फ़ायदा ही फ़ायदा किया है और लिंगभेद मिट जाने पर उनका बड़ा नुकसान हो जाएगा. ये सच है कि रेप, दहेज और घरेलू हिंसा के मामलों की ज्यादातर (हमेशा नहीं) शिकार औरतें ही है. लेकिन कमाऊ पूत होने का दबाव भी ‘सीधी-सादी घरेलू लड़की’ की कसौटी जितना ही मुश्किल है. अब तक नारीवादी आन्दोलनों को ‘मर्दानगी’ के लिए ख़तरा ही समझा गया है. लेकिन लिंग-भेद हटाना सिर्फ लड़कियों के नहीं पूरे समाज के हित में है और इसके साथ पुरुषों को जोड़ने की ज़रूरत है. अगर ये सोच विकसित करने में सफल रहे तो लैंगिक समानता की राह कहीं ज्यादा आसान होगी. 


(ये लेख, जनसत्ता 19 जून 2013  के सम्पादकीय में प्रकाशित है.

लिंक- http://www.jansatta.com/index.php/component/content/article/47260-2013-06-19-04-42-55)

Saturday, June 1, 2013

छठवीं क्लास के सेक्शन ए से लाजवंती और सेक्शन बी से वीर


दोनों का मानना है कि उनकी मम्मियां पेड़ हैं. काहे कि स्कूल में पढ़ाया गया है कि हरे पेड़ अपना खाना खुद बनाते हैं और बाक़ी लोग उन्हीं से अपना खाना लेते हैं. रोटियाँ बेलते हुए मम्मी के हाथ की हरी- हरी नसें देख कर तो शक़ की कोई गुंजाइश ही नहीं रही. अपने- अपने पापाओं को दुनिया का सबसे लंबा इंसान मानने- मनवाने की रोज़ की हुज्ज़त, फिर सर- फुड़ौव्वल. दोनों पक्के वाले दोस्त हैं. एक दूसरे के शरीरों का भेद नहीं जानते. और वो जो पैरों के बीच कुछ है वो दोनों को एक दूसरे का उल्टा बनाता है इस बात से अभी अन्जान हैं. एक दिन समय के देवता इन दोनों को ये रहस्य समझा देंगे. लेकिन फ़िलहाल दोनों बच्चे हैं, बच्चे- दोस्त, दोस्त- बच्चे.
एक दूसरे के सारे रहस्यों, गुनाहों और मम्मी-पापा को धोखा देने के लिए बनाई रणनीतियों के भागीदार. नागराज और ध्रुव की कॉमिक्स कहाँ छुपाई है. ऊपर वाले घर के घंटी बजा कर कौन भागा. लूडो में बेईमानी कैसे की. अपने हिस्से से ज्यादा मिठाई कैसे चुरा के खानी है. पढ़ने की किताबों में सरिता- मनोरमा- कॉमिक्स कैसे छुपा के पढ़ी जाती है? झगड़ा होने पर ये सारी पोल- पट्टी खोल देने की धमकियां. फिर एक-एक घुम्मे-मुक्के और बाल नोंचय्या का हिसाब ले कर कट्टी-मिल्ली. कुछ भले काम भी किये हैं. एक दिन बिजली की तार से छूकर एक चिड़िया वीर के ऊपर आ गिरी. तब से चिड़ियों की जान बचाना शगल बन गया. गुल्लक में थोड़ी बचत भी कर ली है. उसकी खन-खन से सापेक्ष अमीरी-ग़रीबी का हिसाब लगाया जाता है. चलते कूलर के आगे अपनी रोबोट वाली आवाजें निकालना, किसी का घर बनाने के लिए गिराई बालू पर घर बनाना फिर इकठ्ठा की गयी सीपियों के लिए लड़ना. अगर ज़िंदगी सौ बरस की होती है तो दसवां हिस्सा इसी तरह जी लिया है. बच्चे- दोस्त, दोस्त- बच्चे बनके.


सब कुछ बढ़िया चल रहा था कि एक दिन स्कूल में खाने की छुट्टी में पूरी क्लास को रस्साकशी खेलने का भूत सवार हुआ. रस्सी के अभाव में दोनों टीमों के अगवा का हाथ ही खींचा-ताना जा रहा था. लड़के एक तरफ़, लड़कियां एक तरफ़ यही नियम है इस गेम का. ‘अपनी- अपनी टीमों में आ जाओ’ आवाज आई. दोनों सकपका गए, ये उनकी टीमें अलग कब से हो गयीं? उन्हें तो लड़कर भी एक दूसरे की तरफ़ से ही खेलने की आदत है. खैर, बेमन से खेला खेल ख़त्म हुआ पर कौन जीता कौन हारा दोनों को आज तक याद नहीं. फिर तो ये रोज़ का क़िस्सा हो गया. घर- बाहर, स्कूल, हर पीरियड में यही साज़िश. दोनों के बीच दशमलव की बिंदी आकर बैठ गई थी एक दायाँ था दूसरा बायाँ, टोटल वैल्यू कम कर दी खामखाँ. दोनों की दोस्ती गणित का एक समीकरण बन गई जिसमें अनजानी चीजों को ‘एक्स’ मान लिया जाता है. वैसे, बायोलॉजी के एक्स और वाई ने भी कम कहर नहीं ढाया. व्याकरण में अनुलोम- विलोम, स्त्रीलिंग- पुल्लिंग चल रहा है.. लड़का- लड़की, सुनार- सुनारिन, हलवाई- हलवाइन. स्त्री- पुरुष. ही-शी, ती है-ता है का बंटवारा. घर पे पहले बच्चे रोते थे अब लड़का- लड़की रोने लगे, लड़की थोड़ा ज्य़ादा. वीर को तो रोना ही मना हो गया.
धीरे- धीरे लाजवंती और वीर पर भी रंग चढ़ रहा है. आजकल खाने की छुट्टी में वीर ‘अपने जैसों’ के साथ गेंदतड़ी खेलता है और लाजवंती 'अपनी जैसियों’ के साथ साइड में बैठी मुंह पे हाथ धरे धीरे- धीरे ही- ही, खी- खी.
परीक्षा परिणामों के साथ लड्डू बंटे. छठवीं क्लास आ गयी. सेक्शन अलग हो गए लड़के ए में लड़कियां बी में. लड़कों को हाफ की जगह फुल पैंट पहननी है और लड़कियों को दो चोटी करके सफ़ेद रिबन बाँधना है. लाजवंती के बाल अभी छोटे हैं, वो पोनीटेल करके जा सकती है लेकिन होम साइंस पढ़ना जरूरी है.
“नील घोलने की विधि बताओ.”
होती होगी कुछ, लाजवंती की बला से, उसके घर में तो उजाला आता है. घुला-घुलाया, चार बूंदों वाला.
‘हाय राम मिस! इत्ता सरल सवाल?’ ये ज्योति केसरी पक्की चापलूस है मिस की. लाजवंती ने उसे मुंह चिढ़ा दिया. मिस ने उसे टेबल पे खड़े होने की सज़ा दी. 
“जानती हो गांधी जी ने कहा है कि स्त्रियों के लिए गृह- विज्ञान की शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिए. मेरी क्लास में तुम्हें मर्यादित व्यवहार करना होगा.” 
ये बाद की बात है कि लाजवंती को दिल्ली आकर पता चलेगा कि यहाँ लड़कियों को होम साइंस ज़रूरी नहीं है और वो इन सब मिसों, राष्ट्र्पिताओं और ज्योति केसरियों को एक साथ काल्पनिक अंगूठा दिखायेगी, ‘ले बच्चू!’ लेकिन क्लास में तो होम साइंस ने जान ले रक्खी है.
“घर को संभालने वाली को क्या कहते हैं?” मिस ने फिर कोंचा.
“जी हमारा घर तो लालमनी सम्भालती है, हमारी नौकरानी.”
पूरी क्लास को हंसने का दौरा पड़ गया. लाजवंती की सज़ा अपग्रेड हो गयी. उसे अब हाथ ऊपर कर के खड़े रहना होगा. घर जाकर लाजवंती का हाथ बहुत दुखा और मिस ने घर जाकर शांती धरावाहिक देखा. ज्योति केसरी ने घर जाकर सूजी का हलवा बनाया, बहुत बढ़िया!
सेक्शन बी में वीर की हालत भी बुरी थी. उसे लाजवंती के साथ बैठने की आदत थी. टेस्ट में लाजवंती तब तक पन्ना नहीं पलटती थी जब तक वीर पूरी नक़ल न कर ले. होंठ के किनारे से स्पेल्लिंग बताने की कला भी उसी को आती थी. वीर को तो बस ड्राइंग का शौक था. अपनी कॉपी में ज्यादा गुड/ फ़ेयर दिखा कर लाजवंती को टी ली ली ली. कला वाली मिस, जो अपनी लम्बी चोटी में कभी रबरबैंड नहीं लगाती थीं, उनका कहना था कि लड़कों की आर्ट ज्यादा अच्छी नहीं होती इसलिए उन्हें थोड़े प्रयास पे ही अधिक नंबर दे देने चाहियें, वीर तो एक अपवाद है. 
‘लड़की के साथ जो खेला करता था सारा दिन.’
तो लाजवंती लड़की थी?
वीर ने घर जाकर एक नए तरीके का साड़ी का किनारा बनाया. कला वाली मिस ने भी घर जाकर शांती धारावाहिक देखा और अपने बाल खोल कर सो गयीं. लाजवंती को लड़की कहने वाले लड़कों ने अपनी-अपनी पेड़-मम्मियों से लेकर खाना  खाया और कॉन्ट्रा या मारियो जैसा कुछ खेल कर सो गए.
बरसों बाद उस क़स्बे में प्रगति आयेगी और इंग्लिश ‘स्पोकना’ सिखाने वाले सेंटर खुलेंगे. को- एजुकेशन और लव-मैरिज डिबेट के फेवरेट टॉपिक्स होंगे. गर्मागर्म बहस चलेगी. हल क्या निकलेगा पता नहीं. लेकिन लाजवंती और वीर का तो बड़ा नुक़सान हो गया. अब से पूरी क्लास-सर-मिस को पता चल गया है कि लाजवंती ने अपनी कला की कॉपी में कनेर का फूल और तश्तरी में रखा आम कभी खुद नहीं बनाया था. और वीर को विज्ञान का ढेंगा भी नहीं आता था.

(कहानी आगे बढ़ती है- चम्पकवन, ट्रेन और बारामूडा ट्रायेंगल
http://shwetakhatri.blogspot.in/2013/06/comingofage.html)

Wednesday, May 22, 2013

ब्रेस्ट कैंसर के खतरे, पेटेंट के झगड़े, एंजलीना जॅाली और हम


हाल ही में हॉलीवुड सुपरस्टार एंजलीना जॅाली के एक इक़रारनामे ने हलचल मचा दी. इसमें इन्होंने कैंसर के खतरे से बचने के लिए डबल मैसटैक्टमी (सर्जरी द्वारा दोनों स्तन निकलवा दिया जाना) करवाना स्वीकार किया. लेकिन उसके तुरंत बाद ही उनके मिरियड जेनेटिक्स नामक फार्मा कंपनी से गठजोड़ की बात सामने आई और असल मुद्दा रफा- दफा हो गया. कोई उन्हें शूरवीर तो कोई मेडिकल  कार्पोरेट जगत का मोहरा बताने के चक्कर में है. ये कंपनी कैंसर की कारक ब्रैक१ और ब्रैक२ जीनों को पेटेंट कराने की कोशिश में है ऐसा होते ही इस टेस्ट की कीमत सौ गुना तक बढ़ सकती है. कई जगह ये तर्क भी पढ़ने को मिले कि ऐसी चिकित्सा भारतीय महिलाएं अफ़ोर्ड कर ही नहीं सकती.
अगर ये प्रचार का हथकंडा है तो भी हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि मिरियड कंपनी को एंजलीना की ईमेज की ज्य़ादा ज़रूरत है न कि एंजलीना को उनके पैसों की या फिर खुद को फ़रिश्ता साबित करने की. वो पहले ही विश्व की सफलतम, मशहूर और धनी महिलाओं में से एक है. भारतीय महिलाओं का कैंसर के इलाज का खर्च उठा सकें ये सुनिश्चित करना एंजलीना जॅाली की नहीं हमारे नीति नियंताओं की जिम्मेदारी है. अगर किसी के भी पास भरपूर संसाधन और पैसे हों तो वो बिना खर्च की परवाह किये अपनी सेहत के लिए उपाय- इलाज करेगा ही.

लेकिन जो बात  सबसे गौरतलब है वो ये कि ये सर्जरी बीमारी के बाद नहीं पहले की गयी है ताकि कैंसर हो ही न सके. ये एक आसान फैसला नहीं है. स्तन कैंसर कई सामाजिक और भावनात्मक कारणों से बाकी किसी भी कैंसर से अलग है. स्तन मुक्ति का निर्णय भी सांप काटे का जहर रोकने के लिए उंगली पर नश्तर चलवा देने से कहीं ज्य़ादा पेचीदा है. इसकी वजह ब्रेस्ट का महिलाओं के बाकी अंगों से थोड़ा अलग और थोड़ा अधिक महत्त्वपूर्ण होना है. इस थोड़ा अलग और थोड़ा अधिक को हम कई उदाहरणों से समझ सकते हैं- मॉडलों के लिये तय सौन्दर्य मानकों को देख लीजिये, बाज़ार में पैडेड ब्रा और सिलिकॉन ट्रांसप्लांट की उपलब्धि और लोकप्रियता पर नज़र डालिए या फिर किसी भी लड़की से उसके साथ हुई छेड़छाड़ के अनुभव पूछ डालिए. खुले आम स्तन- प्रदर्शन और इसकी बीमारी तक के बारे में बात करना अपराध तो नहीं लेकिन अश्लील हर समाज में माना जाता है. अगर याद हो तो कुछ समय पहले विवादित खिलाड़ी पिंकी प्रमाणिक, जिनका जेंडर संदेह के घेरे में था, की कुछ तस्वीरें मीडिया में आई थीं. इसमें एक पुलिस वाले ने उन्हें सीने के पास से अभद्र तरीके से पकड़ रखा था. कुछ तो अलग है इस अंग में!
इस थोड़े अलग और थोड़े अधिक महत्त्व की वजह से ये अंग लड़कियों की सेक्चुअलिटी, आकर्षण और धीरे- धीरे उनके आत्मविश्वास का भी अहम् हिस्सा बन जाता है. बीमारी को रोकने के लिए हम सब टीके- दवाएं आम तौर पर इस्तेमाल करते हैं. लेकिन कैंसर पैदा करने वाले जीन पाए जाने पर स्तनों से ही छुटकारा पा लेना आमतौर पर देखने में नहीं आता. हमारे समाज में लड़कियों की सबसे बड़ी उपयोगिता उनका बच्चे पैदा करने और पालने की क्षमता को ही समझा जाता है. बचपन से ही उनकी ये ट्रेनिंग शुरू हो जाती है. समय पे शादी करने, सिगरेट न पीने से लेकर तमाम मशविरे दिए जाते हैं ताकि उनके माँ बनने में दिक्कत ना आये. ऐसे में स्तन- मुक्ति सिर्फ एक निजी फैसला नहीं रह जाता.
इस ख़बर से किसी को हिम्मत मिली हो या न मिली हो, एंजलीना की स्वीकारोक्ती ने इस प्रतिबंधित विषय को मीडिया के जरिये हर घर के ड्राइंग रूम तक तो पहुंचा ही दिया है. हालांकि समाज के सौन्दर्य मानकों को वो भी धता- बता नहीं सकीं और ब्रेस्ट ट्रांसप्लांट करवा ही लिया. इसका एक कारण ये भी है कि जिस प्रोफेशन में वो हैं, उसमें रहकर सौन्दर्य मानकों की अनदेखी कर पाना मुमकिन नहीं है. कोशिश ये करनी होगी ये तमाम बहस कुछ ठोस बदलाव ला सके. औरतें फार्मा कंपनी के फैलाये आतंक के जाल में ना आये और ना ही सामाजिक दबाव में आकर अपने स्वास्थ्य की अनदेखी करें. साथ ही उनके पास इतनी जानकारी और संसाधन हों कि वो सोच समझ कर स्तनों को रखने या न रखने का फैसला ले सकें. इस खबर ने कम से कम शुरूआती माहौल तो तैयार कर दिया है.

Sunday, May 12, 2013

हमारी निकम्मी मम्मियां

उन्हें सारी चीज़ों के भाव रटे होंगे. वो दूधवाले के नागों का, कामवाली की छुट्टियों का, किराने की दूकान के उधारों का मुंहज़बानी हिसाब रखेंगी. फल- सब्ज़ी वालों से मोल- तोल करके सबसे सस्ता सौदा खरीद कर लायेंगी. पर बजट की घोषणा होगी तो आप अखबार झपट लेंगे- ‘ये पॉलिटिक्स है मम्मी, आप नहीं समझेंगी.’
ये दिन भर मिक्सी, कुकर, चूल्हे से जूझेंगी. वाशिंग मशीन, माइक्रोवेव और फ्रिज के अति कॉम्प्लिकेटेड बटनों के साथ माथापच्ची करेंगीं. लेकिन कम्प्यूटर और कार की सीटों पर आप कुंडली मारकर बैठ जायेंगे- ‘ये नयी टेक्नॉलोजी है मम्मी, आप नहीं समझेंगी.’
ये सुबह आपको जगाएँगी. आपके इस्तेमाल की सब चीजें तैयार रखेंगी. घर से निकलने से पहले मोबाइल, पर्स, पैसे रख लेने की याद दिलाएंगी. आपके वापस आने से पहले आपका अस्त- व्यस्त किया कमरा कोरा- चिट्टा कर देंगी. बाहर आप माँ- बाप का प्रोफेशन पूछे जाने पर आप धीमे सुर में बोलेंगे- ‘मेरी मम्मी कुछ नहीं करतीं, वो हॉउसवाइफ हैं.’
आप के इस मनोवैज्ञानिक रोग की छूत धीरे- धीरे इन्हें भी लग गयी है. ये ना अपना मनपसंद खाना बनाएंगी, ना अपने कपड़े- लत्तों का ध्यान रखेंगी. आपके सर दर्द भर से इनके माथे पर शिकन आ जाएगी लेकिन अपनी बीमारियों को कोई बड़ी बात नहीं समझेंगी. कुछ पूछने पर कहेंगी- ‘अरे मेरा क्या है मैं कौन सी कामकाजी हूँ, दिन भर घर पर ही तो रहती हूँ.’
अगर आपकी मम्मियां भी ये सारे लक्षण दिखाती हैं- अपनी मर्जी का खाती- पहनती नहीं, दिन भर तेल- हल्दी से सने कपड़े लादे रहतीं हैं, अपने ऊपर पैसे खर्च करने से कतराती हैं, उनका फेवरेट कुछ भी नहीं है, सबकी पसंद को ही अपनी पसंद बताती हैं, कभी साथ बैठ कर खाना नहीं खाती, बाद में सबका बचा- खुचा बटोरती हैं. तो समझ जाइए कि आप बहुत बीमार हैं (आपकी मम्मी नहीं). आप ‘माय मदर डज़ नॉट वर्क सिंड्रोम’ से ग्रस्त हैं.
दरअसल कुछ काम करने का हमारा सीधा मतलब कुछ पैसे कमाने से है. जो कमाता नहीं, वो कुछ नहीं करता. इसी तरह जिस काम के लिए हमें ठोस मुद्रा के रूप में कोई कीमत नहीं चुकानी पड़ती उसकी हमें कोई क़द्र नहीं होती. हमारी मम्मियों का काम भी इसी श्रेणी में आता है. घर- बच्चे संभालने को किसी भी समाज में कोई बड़ा या बौद्धिक काम नहीं समझा जाता.
लड़कियों को जबरन घरेलू कामों की शिक्षा देना और उनकी इच्छा के विरुद्ध उन्हें गृहकार्य और मातृत्व की तरफ़ धकेले जाना बुरा है. लड़कियां प्राकृतिक रूप से इन कामों में दक्ष होती हैं, ये हमारा भ्रम है. अगर ऐसा होता तो फाइव स्टार होटलों के शेफ से लेकर चाट का ठेला लगाने वाले तक, पड़ोस के दर्जी से लेकर फैशन डिज़ाइनर और नामी पेंटर- डांसरों तक सब के सब ज्य़ादातर पुरुष नहीं होते. लड़कियों को अपना करियर छोड़ कर घर पर ध्यान लगाने के शिक्षा देते रहना बुरा ज़रूर है लेकिन इसका हल घरेलू औरतों की अवमानना नहीं है. इसका हल उनके काम की क़द्र किया जाना है. अगर हम लड़कियों के डॉक्टर, इंजीनियर बनने की सराहना करते हैं तो उनके गृहणी बन जाने को उनकी शिक्षा का बेकार जाना क्यों समझ लेते हैं? अगर महिला अपनी मर्जी से घर- बच्चे संभालने का निर्णय लेती है तो इसमें कोई बुराई नहीं. बुराई है पहले तो उनको ऐसा करने पर मजबूर किये जाने में और फिर उनको घर में दोयम दर्जा देने में और ये समझने में कि जिस औरत ने सिर्फ बच्चे पैदा किये और घर संभाला उसने कोई महत्वपूर्ण काम नहीं किया. सबसे भयंकर बात ये है कि खुद गृहणियों ने भी इन सारे पूर्वाग्रहों को सही मान लिया है. वो खुद भी अपने शारीरिक- मानसिक सेहतमंदी को प्राथमिकता नहीं देती. हमें खुद को और उनको भी ऐसी सोच से बचाना होगा. 
मेरी नजर में एक आदर्श समाज वो होगा जहाँ स्त्री- पुरुष में से कोई भी अपनी- अपनी क्षमता और रूचि के हिसाब से अपना काम चुन सकेंगे और अपनी घरेलू जिम्मेदारियों को साझा कर सकेंगे.  इसके लिए उन्हें किसी की आलोचना का डर नहीं होगा. ना तो लडकियों के करियर चुनने पर कोई बंदिश होगी और न ही हॉउसवाइफ होने को पिछड़ेपन की निशानी समझा जाएगा. ऐसे समाज को बनाने के लिए सबसे पहले घर के कामों को और इन्हें करने वालों को उचित महत्त्व दिया जाना ज़रूरी है.

दो विशेष बातें-
१.      ये (उपदेश) लड़के और लड़कियों दोनों के लिए है. अपनी मम्मियों को निकम्मा मानने में हममें से कोई भी कम नहीं है!
२.      ये कोई मदर्स डे विशेषांक नहीं है. कुछ बीमारियाँ हमारी सोच और समाज को लगातार त्रस्त करती आ रहीं हैं. इनसे लड़ने की कोशिश भी उतनी ही व्यापक और निरंतर होनी चाहिए. ये डे- फे तो सिर्फ आर्चीज़- हॉलमार्क का भला करने के लिए बने हैं.