Monday, April 22, 2013

धरम, शरम, शरीर........


“लाजवंती करीब तेरह- एक साल की रही होगी. एक रात हड़बड़ा कर उठ गई. कपड़ों पे खून के दाग देखकर सर चकरा गया. उसका स्रोत जानकर हालत और खराब हो गई. पक्का कोई खतरनाक बीमारी हो गई है... शायद.... कैंसर.... सुबह सारा माज़रा देख कर घर की औरतों में कनखियों- इशारों में बातें हुईं. उसे घेर कर एक अलग कमरे में ले जाया गया जहां से निकलने को वो आज भी छटपटाती है.”
दस साल की उम्र से ही मुझे कुछ- कुछ आभास होने लगा था कि मेरे आस- पास कोई रहस्यमय घटना घट रही है. कोई चीज़ अख़बारों में, काली पन्नियों में छिपा कर लाई जाती है और बड़े एहतियात से अलमारी के कोनों में सहेज दी जाती है. कुछ पूछने पर मम्मी आँख दिखाती हैं. बड़ी बहनें कभी मंदिर तो कभी रसोई की दहलीज पर खड़ी मिलती हैं. वजह पूछने पर बस शर्मा कर धौल- धप्प लगा देती हैं. बहुत जासूसी की, पर कुछ फायदा नहीं हुआ. सबने कहा वक्त आने पर बता दिया जाएगा.
पर जब बताया गया तो भी क्या- ‘लड़कों के साथ मत खेलना’, ‘ये मत छूना’, ‘वो मत करना’, ‘बाहर आना- जाना कम करो बड़ी हो गयी हो’... ‘हाइजीन’, ‘ओव्यूलेशन’ और ‘मीनार्की’ जैसे नाम न लिए गए, न लेने की जरूरत समझी गई. शर्म- धरम ने बायलौजी को जकड़ लिया. पूतने- फलने और वंश- बेल के चिरंजीवी होने का आशीर्वाद देने वाले ये भी बताना भूल गए कि वंश बढ़ाने के लिए इस प्रक्रिया की क्या  ज़रूरत है. आगे चलकर विज्ञान लेने तक मुझे सिर्फ इतना ही पता था की कोई ये कुछ गन्दा और शर्मनाक है. जो लड़कियां स्कूल- कॉलेजों में विज्ञान नहीं लेतीं, पता नहीं वो इस बेवजह की शर्म से कैसे उबर पाती हैं.
वैसे विज्ञान पढ़े- लिखे भी क्या ख़ाक उबर पाते हैं? एक बार मेरे साथ की एक लड़की ने मुझसे कहा कि, “तुम पढ़- लिख गयी हो इसका मतलब ये नहीं अपनी धर्म- संस्कृति भूल जाओ.” मानों हमारा शरीर नहीं, कल्चर कन्सर्वेशन की साईट हो. सब रक्षण- संरक्षण इसी पर होना है. एक डॉक्टर ने भी मुझसे कहा कि, “ये सब मैं इंग्लिश में तो समझा सकती हूँ, पर हिंदी में ये बातें बड़ी भौंडी लगती हैं.” हम सब अपनी हिंदी में इन शब्दों को बोलने से कतराते हैं. आखिर क्यूँ? क्यूंकि भाषा हम अपने माँ- बाप, बड़े-बूढों से सीखते हैं. उन्होंने कभी ये सब शब्द हमसे नहीं कहे इसलिए हमारी जबान और कानों को भी ये अजीब लगते हैं. इस असहजता को हम इंग्लिश के परायेपन और सोफस्टिकेशन (?) में छुपाने की कशिश करते हैं.
मेरे जैसी मॉडर्न लड़कियां अपने लिए अशुध्द, अपवित्र जैसे शब्द इस्तेमाल करने में अपनी हेठी समझती हैं. पर हमारे भी अपने कोडवर्ड्स हैं. संकेतों- इशारों की अपनी बेग्मती जबान है. इस बात का ख़ास ख़याल रखा जाता है की पास खड़े लड़कों को भनक भी न लगे. सेल काउंटर पर लड़की बैठी हो ऐसी दुकानें ढूंढी जाती हैं.
विज्ञापनों ने भी इस शर्म की संस्कृति को सींचने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. ‘उन दिनों’ (नाम लेने में इन्हें भी शर्म आती है, ये सिर्फ ‘व्हिस्पर’ करते हैं) में दाग लगने के डर से लड़कियां टॉप नहीं कर पा रही हैं, डेट पर नहीं जा रहीं हैं, और तो और ठीक से सो भी नहीं पा रहीं हैं. हंसी आती है पर ये हंसने की बात नहीं है. अपने शरीर को जानने और उस पर अपना अधिकार समझने की शुरुआत, इसके बारे में बात करने से होती है. अपनी भाषा में.... हर भाषा में.

13 comments:

  1. bahot accha likha hai...waiting for more.

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    1. thank you Mohit. U'll have more every sunday! :)

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  2. Very nice.....keep it up!!!!!!! This is really the right time to be vocal on these issues.....

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    1. Vocal in every language, thank you Pooja!

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  3. ऐसे बंद विषय पर इतना खुलकर लिखने का चलन हिन्दी में नहीं है। वह भी जिसका शरीर वह खुद मुखर हो जाए, ऐसा तो दिखता भी नहीं है। आमतौर पर विचारों का यह खुलापन अंग्रेजी में ही नजर आता है। हिन्दी में इस खुलेपन के लिए, लिखना जारी रहे..........

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    1. धन्यवाद संजय जी, ये जारी रहेगा!

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  4. साहसिक पर अच्छा लेख ……… हम भारतीय कोणार्क, खुजराहो के मंदिर बना सकते हैं ,पर बच्चों की योन जिज्ञासा को शांत नहीं कर सकते ,कामसूत्र का जन्म हमारे ही देश में हुआ ,पर काम विषयक सही जानकारी का यहाँ अभाव है !

    http://achhibatein.blogspot.in/

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  5. धन्यवाद नीरज जी!

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  6. Shweta Ma'am you are really brave.
    can't stop myself reading you other blogs. Each and every blog of yours points on one particular thing.

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    1. Keep reading Pradeep ji! I don't think of it as something brave. It should be something very normal to talk about. :)

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    2. Ya i hope it will work out in coming days.

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