Sunday, June 16, 2013

पुरुष होने के लिए.....


जेंडर स्टडीज़ की क्लास का पहला दिन था. जैसा कि होता आया है लड़के गिने- चुने ही थे. सबसे पूछा गया कि आपने ये कोर्स क्यों लिया? लड़कियां बढ़- चढ़ कर जवाब दे रही थीं. किसी की रूचि अकादमिक थी तो कोई अपनी व्यक्तिगत समस्याएं गिना रही था. लड़कों की बारी आई तो ज्यादातर का यही जवाब था- ‘मैं जानना चाहता हूँ कि हमारे देश में लड़कियों की स्थिति इतनी बुरी क्यूं है?’ ये भावना क़ाबिल-ए-तारीफ़ है लेकिन एक सवाल भी उठाती है- क्या जेंडर शब्द सिर्फ लड़कियों के लिए बना है? क्या लड़के कभी ये महसूस करते भी हैं कि जेंडर उनकी जिन्दगी के हर क्षेत्र में घुसपैठिया है? हर देश- राज्य, हर यूनिवर्सिटी में जेंडर से सम्बंधित विषयों में लड़कों की संख्या इनी- गिनी ही है. कुछ हद तक ये समझा जा सकता है कि अमेरिकी विश्विद्यालयों के अमेरिकन- अफ्रीकन अध्ययन विभागों में अश्वेत लोगों की संख्या ज्यादा क्यूँ है या फिर अपने देश में ज़ामिया यूनिवर्सिटी का जो नार्थ- ईस्ट रिसर्च सेंटर है जहां ज्यादातर प्रोफ़ेसर- शोधकर्ता देश के उत्तर-पूर्वी राज्यों से ही क्यूं हैं. कभी-कभी किसी क्षेत्र, नस्ल या मुद्दे से आपकी क़रीबी आपकी अकादमिक रूचि भी बन जाती है. लेकिन जेंडर की घुसपैठ तो सिर्फ लड़कियों की जिन्दगी तक ही सीमित नहीं फिर जेंडर स्टडीज़ होम साइंस की तरह ही लड़कियों का विषय कैसे बन गया? क्या लैंगिक असमानता की वजह से लड़के कोई भेद- भाव महसूस करते हैं? लेकिन उससे भी पहले एक सवाल- क्या लैंगिक असमानता लड़कों पर भी कोई प्रभाव डालती है? 
हर उस औरत के लिए जो घर के काम- काज करने पर मजबूर है, एक आदमी है जिस पर घर भर के लिए कमाने और स्थाई नौकरी पाने का दबाव है. हर ‘अबला’ जो अपनी सुरक्षा खुद नहीं कर सकती उसकी रक्षा के लिए एक लड़के को ‘मर्द’ बनना है. हमारी फ़िल्में, शेविंग क्रीम और चड्ढी- बनियान के ऐड सिर्फ लड़कियों की ख़ूबसूरती ही नहीं, मर्द की ‘मर्दानगी’ के भी मानक गढ़ते रहें हैं. हिरोइन किसी भी कोने-गढ़े में सौ- पचास गुंडों से घिर कर मदद के लिए पुकारे, हीरो को आना ही है और सारे गुंडों को अकेले हराना ही है. ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ में एक सीन है, गोलाबारी हो चुकी है और खतरा मंडरा रहा है, ऐसे में एक मर्द कहता है- ‘लेडीज़ लोग अन्दर जाइए, चलिए.’ ये एक फ़िल्म की नहीं पूरे समाज की कहानी है. पुरुष को चाहे-अनचाहे माँ, बहनों का रक्षक, घर का शासक- अनुशासक बनना ही है. प्यार में पहल उन्हें ही करनी है. लड़की के हँसी- इशारों को समझने में देर नहीं करनी है. डेट पर गए तो लडकी के लिए दरवाज़ा खोलना है,  कुर्सी खींचनी है और बिल न देने का तो कोई सवाल ही नहीं है.  लिंगभेद से उपजे बंटवारे की सबसे ऊंची पायदानों पर ज्यादातर पुरुष हैं, लेकिन सबसे निचली पायदान पर भी वो ही हैं. डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक का नाम लेते ही हमारे दिमाग में सबसे पहले पुरुष की छवि कौंधती है लेकिन चोर, लुटेरे और सटोरिये जैसे शब्द भी पुरुषों के लिए ही बने लगते हैं. हर कोई मर्द के बजाय महिलाओं पर ज्यादा जल्दी भरोसा कर लेता है और उनकी मदद के लिए झट से तैयार हो जाता है. सबसे ख़तरनाक कामों के लिए भी हम पुरुषों को ही आगे करते हैं. रात- बेरात बिजली के टूटे तारों की मरम्मत उन्हें ही करनी है, युद्ध पर भी उन्हें ही जाना है. आकड़ों की मानें तो ‘ऑन ड्यूटी डेथ’ में पुरुषों की संख्या महिलाओं से कहीं अधिक है. 
हरेक सभ्यता ने अपने विकास के दौरान स्त्री और पुरुष दोनों का इस्तेमाल किया है. अब सवाल ये है कि सिर्फ लड़कियां ही अपने जीवन में इस शोषण की मौजूदगी क्यूँ महसूस करतीं हैं, लड़कों को ये दबाव क्यों नहीं पता चलता? इसकी वजह ये है कि मर्दानगी से जुड़ी हर एक चीज़ का स्थान समाज में ‘नारीत्व’ से जुड़ी हर एक चीज़ से ऊंचा है. घर में ‘ब्रेडविनर’ का दर्जा ‘हाऊसवाइफ’ से अव्वल है. आक्रामक होना बहादुरी है और रोना कमज़ोरी है. युद्ध में खून बहाना बहादुरी है और मासिक चक्र में खून बहना अशुद्धी और कमज़ोरी की निशानी है. लड़की का कमाना, मर्दाने कपड़े पहनना और बाहर के काम करना बहादुरी है लेकिन लड़के के लिए लड़कियों वाले काम करना अपना मज़ाक बनवाना है. कभी सोच कर देखिये कि हिजड़े हमेशा औरतों जैसे ही कपड़े क्यूं पहनते हैं? दरअसल इस विभाजन में लड़का- लड़की विपरीत होकर एक दूसरे के आमने सामने नहीं ऊपर-नीचे का दर्जा पा चुके है. एक फेमिनिस्ट लेखक ने कहीं कहा था कि- ‘बेटी को तो कोई भी बेटे की तरह पाल सकता है लेकिन अपने बेटे को बेटी की तरह पालने के लिए हिम्मत चाहिए.’ मर्दानगी और इससे जुड़े गुण समाज के लिए मानक (स्टैण्डर्ड) हैं बाकी सब कमतर है. इसलिए बेटे को बेटी जैसा सम्वेदनशील नहीं बनाया जा सकता. हर क्षेत्र के प्रशंसित और सफल लोगों में, घर में ज्यादा खाना पाने वालों में, बहन के मुकाबले पढ़ाई के लिए ज्यादा बजट पाने वालों में, पुरुष जहाँ देखते हैं वहां वो ही वो हैं. इसलिए ये असमानता उन्हें नहीं कोंचती. ऐसा लगता है कि जेंडर ने पुरुषों का फ़ायदा ही फ़ायदा किया है और लिंगभेद मिट जाने पर उनका बड़ा नुकसान हो जाएगा. ये सच है कि रेप, दहेज और घरेलू हिंसा के मामलों की ज्यादातर (हमेशा नहीं) शिकार औरतें ही है. लेकिन कमाऊ पूत होने का दबाव भी ‘सीधी-सादी घरेलू लड़की’ की कसौटी जितना ही मुश्किल है. अब तक नारीवादी आन्दोलनों को ‘मर्दानगी’ के लिए ख़तरा ही समझा गया है. लेकिन लिंग-भेद हटाना सिर्फ लड़कियों के नहीं पूरे समाज के हित में है और इसके साथ पुरुषों को जोड़ने की ज़रूरत है. अगर ये सोच विकसित करने में सफल रहे तो लैंगिक समानता की राह कहीं ज्यादा आसान होगी. 


(ये लेख, जनसत्ता 19 जून 2013  के सम्पादकीय में प्रकाशित है.

लिंक- http://www.jansatta.com/index.php/component/content/article/47260-2013-06-19-04-42-55)

Saturday, June 1, 2013

छठवीं क्लास के सेक्शन ए से लाजवंती और सेक्शन बी से वीर


दोनों का मानना है कि उनकी मम्मियां पेड़ हैं. काहे कि स्कूल में पढ़ाया गया है कि हरे पेड़ अपना खाना खुद बनाते हैं और बाक़ी लोग उन्हीं से अपना खाना लेते हैं. रोटियाँ बेलते हुए मम्मी के हाथ की हरी- हरी नसें देख कर तो शक़ की कोई गुंजाइश ही नहीं रही. अपने- अपने पापाओं को दुनिया का सबसे लंबा इंसान मानने- मनवाने की रोज़ की हुज्ज़त, फिर सर- फुड़ौव्वल. दोनों पक्के वाले दोस्त हैं. एक दूसरे के शरीरों का भेद नहीं जानते. और वो जो पैरों के बीच कुछ है वो दोनों को एक दूसरे का उल्टा बनाता है इस बात से अभी अन्जान हैं. एक दिन समय के देवता इन दोनों को ये रहस्य समझा देंगे. लेकिन फ़िलहाल दोनों बच्चे हैं, बच्चे- दोस्त, दोस्त- बच्चे.
एक दूसरे के सारे रहस्यों, गुनाहों और मम्मी-पापा को धोखा देने के लिए बनाई रणनीतियों के भागीदार. नागराज और ध्रुव की कॉमिक्स कहाँ छुपाई है. ऊपर वाले घर के घंटी बजा कर कौन भागा. लूडो में बेईमानी कैसे की. अपने हिस्से से ज्यादा मिठाई कैसे चुरा के खानी है. पढ़ने की किताबों में सरिता- मनोरमा- कॉमिक्स कैसे छुपा के पढ़ी जाती है? झगड़ा होने पर ये सारी पोल- पट्टी खोल देने की धमकियां. फिर एक-एक घुम्मे-मुक्के और बाल नोंचय्या का हिसाब ले कर कट्टी-मिल्ली. कुछ भले काम भी किये हैं. एक दिन बिजली की तार से छूकर एक चिड़िया वीर के ऊपर आ गिरी. तब से चिड़ियों की जान बचाना शगल बन गया. गुल्लक में थोड़ी बचत भी कर ली है. उसकी खन-खन से सापेक्ष अमीरी-ग़रीबी का हिसाब लगाया जाता है. चलते कूलर के आगे अपनी रोबोट वाली आवाजें निकालना, किसी का घर बनाने के लिए गिराई बालू पर घर बनाना फिर इकठ्ठा की गयी सीपियों के लिए लड़ना. अगर ज़िंदगी सौ बरस की होती है तो दसवां हिस्सा इसी तरह जी लिया है. बच्चे- दोस्त, दोस्त- बच्चे बनके.


सब कुछ बढ़िया चल रहा था कि एक दिन स्कूल में खाने की छुट्टी में पूरी क्लास को रस्साकशी खेलने का भूत सवार हुआ. रस्सी के अभाव में दोनों टीमों के अगवा का हाथ ही खींचा-ताना जा रहा था. लड़के एक तरफ़, लड़कियां एक तरफ़ यही नियम है इस गेम का. ‘अपनी- अपनी टीमों में आ जाओ’ आवाज आई. दोनों सकपका गए, ये उनकी टीमें अलग कब से हो गयीं? उन्हें तो लड़कर भी एक दूसरे की तरफ़ से ही खेलने की आदत है. खैर, बेमन से खेला खेल ख़त्म हुआ पर कौन जीता कौन हारा दोनों को आज तक याद नहीं. फिर तो ये रोज़ का क़िस्सा हो गया. घर- बाहर, स्कूल, हर पीरियड में यही साज़िश. दोनों के बीच दशमलव की बिंदी आकर बैठ गई थी एक दायाँ था दूसरा बायाँ, टोटल वैल्यू कम कर दी खामखाँ. दोनों की दोस्ती गणित का एक समीकरण बन गई जिसमें अनजानी चीजों को ‘एक्स’ मान लिया जाता है. वैसे, बायोलॉजी के एक्स और वाई ने भी कम कहर नहीं ढाया. व्याकरण में अनुलोम- विलोम, स्त्रीलिंग- पुल्लिंग चल रहा है.. लड़का- लड़की, सुनार- सुनारिन, हलवाई- हलवाइन. स्त्री- पुरुष. ही-शी, ती है-ता है का बंटवारा. घर पे पहले बच्चे रोते थे अब लड़का- लड़की रोने लगे, लड़की थोड़ा ज्य़ादा. वीर को तो रोना ही मना हो गया.
धीरे- धीरे लाजवंती और वीर पर भी रंग चढ़ रहा है. आजकल खाने की छुट्टी में वीर ‘अपने जैसों’ के साथ गेंदतड़ी खेलता है और लाजवंती 'अपनी जैसियों’ के साथ साइड में बैठी मुंह पे हाथ धरे धीरे- धीरे ही- ही, खी- खी.
परीक्षा परिणामों के साथ लड्डू बंटे. छठवीं क्लास आ गयी. सेक्शन अलग हो गए लड़के ए में लड़कियां बी में. लड़कों को हाफ की जगह फुल पैंट पहननी है और लड़कियों को दो चोटी करके सफ़ेद रिबन बाँधना है. लाजवंती के बाल अभी छोटे हैं, वो पोनीटेल करके जा सकती है लेकिन होम साइंस पढ़ना जरूरी है.
“नील घोलने की विधि बताओ.”
होती होगी कुछ, लाजवंती की बला से, उसके घर में तो उजाला आता है. घुला-घुलाया, चार बूंदों वाला.
‘हाय राम मिस! इत्ता सरल सवाल?’ ये ज्योति केसरी पक्की चापलूस है मिस की. लाजवंती ने उसे मुंह चिढ़ा दिया. मिस ने उसे टेबल पे खड़े होने की सज़ा दी. 
“जानती हो गांधी जी ने कहा है कि स्त्रियों के लिए गृह- विज्ञान की शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिए. मेरी क्लास में तुम्हें मर्यादित व्यवहार करना होगा.” 
ये बाद की बात है कि लाजवंती को दिल्ली आकर पता चलेगा कि यहाँ लड़कियों को होम साइंस ज़रूरी नहीं है और वो इन सब मिसों, राष्ट्र्पिताओं और ज्योति केसरियों को एक साथ काल्पनिक अंगूठा दिखायेगी, ‘ले बच्चू!’ लेकिन क्लास में तो होम साइंस ने जान ले रक्खी है.
“घर को संभालने वाली को क्या कहते हैं?” मिस ने फिर कोंचा.
“जी हमारा घर तो लालमनी सम्भालती है, हमारी नौकरानी.”
पूरी क्लास को हंसने का दौरा पड़ गया. लाजवंती की सज़ा अपग्रेड हो गयी. उसे अब हाथ ऊपर कर के खड़े रहना होगा. घर जाकर लाजवंती का हाथ बहुत दुखा और मिस ने घर जाकर शांती धरावाहिक देखा. ज्योति केसरी ने घर जाकर सूजी का हलवा बनाया, बहुत बढ़िया!
सेक्शन बी में वीर की हालत भी बुरी थी. उसे लाजवंती के साथ बैठने की आदत थी. टेस्ट में लाजवंती तब तक पन्ना नहीं पलटती थी जब तक वीर पूरी नक़ल न कर ले. होंठ के किनारे से स्पेल्लिंग बताने की कला भी उसी को आती थी. वीर को तो बस ड्राइंग का शौक था. अपनी कॉपी में ज्यादा गुड/ फ़ेयर दिखा कर लाजवंती को टी ली ली ली. कला वाली मिस, जो अपनी लम्बी चोटी में कभी रबरबैंड नहीं लगाती थीं, उनका कहना था कि लड़कों की आर्ट ज्यादा अच्छी नहीं होती इसलिए उन्हें थोड़े प्रयास पे ही अधिक नंबर दे देने चाहियें, वीर तो एक अपवाद है. 
‘लड़की के साथ जो खेला करता था सारा दिन.’
तो लाजवंती लड़की थी?
वीर ने घर जाकर एक नए तरीके का साड़ी का किनारा बनाया. कला वाली मिस ने भी घर जाकर शांती धारावाहिक देखा और अपने बाल खोल कर सो गयीं. लाजवंती को लड़की कहने वाले लड़कों ने अपनी-अपनी पेड़-मम्मियों से लेकर खाना  खाया और कॉन्ट्रा या मारियो जैसा कुछ खेल कर सो गए.
बरसों बाद उस क़स्बे में प्रगति आयेगी और इंग्लिश ‘स्पोकना’ सिखाने वाले सेंटर खुलेंगे. को- एजुकेशन और लव-मैरिज डिबेट के फेवरेट टॉपिक्स होंगे. गर्मागर्म बहस चलेगी. हल क्या निकलेगा पता नहीं. लेकिन लाजवंती और वीर का तो बड़ा नुक़सान हो गया. अब से पूरी क्लास-सर-मिस को पता चल गया है कि लाजवंती ने अपनी कला की कॉपी में कनेर का फूल और तश्तरी में रखा आम कभी खुद नहीं बनाया था. और वीर को विज्ञान का ढेंगा भी नहीं आता था.

(कहानी आगे बढ़ती है- चम्पकवन, ट्रेन और बारामूडा ट्रायेंगल
http://shwetakhatri.blogspot.in/2013/06/comingofage.html)

Wednesday, May 22, 2013

ब्रेस्ट कैंसर के खतरे, पेटेंट के झगड़े, एंजलीना जॅाली और हम


हाल ही में हॉलीवुड सुपरस्टार एंजलीना जॅाली के एक इक़रारनामे ने हलचल मचा दी. इसमें इन्होंने कैंसर के खतरे से बचने के लिए डबल मैसटैक्टमी (सर्जरी द्वारा दोनों स्तन निकलवा दिया जाना) करवाना स्वीकार किया. लेकिन उसके तुरंत बाद ही उनके मिरियड जेनेटिक्स नामक फार्मा कंपनी से गठजोड़ की बात सामने आई और असल मुद्दा रफा- दफा हो गया. कोई उन्हें शूरवीर तो कोई मेडिकल  कार्पोरेट जगत का मोहरा बताने के चक्कर में है. ये कंपनी कैंसर की कारक ब्रैक१ और ब्रैक२ जीनों को पेटेंट कराने की कोशिश में है ऐसा होते ही इस टेस्ट की कीमत सौ गुना तक बढ़ सकती है. कई जगह ये तर्क भी पढ़ने को मिले कि ऐसी चिकित्सा भारतीय महिलाएं अफ़ोर्ड कर ही नहीं सकती.
अगर ये प्रचार का हथकंडा है तो भी हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि मिरियड कंपनी को एंजलीना की ईमेज की ज्य़ादा ज़रूरत है न कि एंजलीना को उनके पैसों की या फिर खुद को फ़रिश्ता साबित करने की. वो पहले ही विश्व की सफलतम, मशहूर और धनी महिलाओं में से एक है. भारतीय महिलाओं का कैंसर के इलाज का खर्च उठा सकें ये सुनिश्चित करना एंजलीना जॅाली की नहीं हमारे नीति नियंताओं की जिम्मेदारी है. अगर किसी के भी पास भरपूर संसाधन और पैसे हों तो वो बिना खर्च की परवाह किये अपनी सेहत के लिए उपाय- इलाज करेगा ही.

लेकिन जो बात  सबसे गौरतलब है वो ये कि ये सर्जरी बीमारी के बाद नहीं पहले की गयी है ताकि कैंसर हो ही न सके. ये एक आसान फैसला नहीं है. स्तन कैंसर कई सामाजिक और भावनात्मक कारणों से बाकी किसी भी कैंसर से अलग है. स्तन मुक्ति का निर्णय भी सांप काटे का जहर रोकने के लिए उंगली पर नश्तर चलवा देने से कहीं ज्य़ादा पेचीदा है. इसकी वजह ब्रेस्ट का महिलाओं के बाकी अंगों से थोड़ा अलग और थोड़ा अधिक महत्त्वपूर्ण होना है. इस थोड़ा अलग और थोड़ा अधिक को हम कई उदाहरणों से समझ सकते हैं- मॉडलों के लिये तय सौन्दर्य मानकों को देख लीजिये, बाज़ार में पैडेड ब्रा और सिलिकॉन ट्रांसप्लांट की उपलब्धि और लोकप्रियता पर नज़र डालिए या फिर किसी भी लड़की से उसके साथ हुई छेड़छाड़ के अनुभव पूछ डालिए. खुले आम स्तन- प्रदर्शन और इसकी बीमारी तक के बारे में बात करना अपराध तो नहीं लेकिन अश्लील हर समाज में माना जाता है. अगर याद हो तो कुछ समय पहले विवादित खिलाड़ी पिंकी प्रमाणिक, जिनका जेंडर संदेह के घेरे में था, की कुछ तस्वीरें मीडिया में आई थीं. इसमें एक पुलिस वाले ने उन्हें सीने के पास से अभद्र तरीके से पकड़ रखा था. कुछ तो अलग है इस अंग में!
इस थोड़े अलग और थोड़े अधिक महत्त्व की वजह से ये अंग लड़कियों की सेक्चुअलिटी, आकर्षण और धीरे- धीरे उनके आत्मविश्वास का भी अहम् हिस्सा बन जाता है. बीमारी को रोकने के लिए हम सब टीके- दवाएं आम तौर पर इस्तेमाल करते हैं. लेकिन कैंसर पैदा करने वाले जीन पाए जाने पर स्तनों से ही छुटकारा पा लेना आमतौर पर देखने में नहीं आता. हमारे समाज में लड़कियों की सबसे बड़ी उपयोगिता उनका बच्चे पैदा करने और पालने की क्षमता को ही समझा जाता है. बचपन से ही उनकी ये ट्रेनिंग शुरू हो जाती है. समय पे शादी करने, सिगरेट न पीने से लेकर तमाम मशविरे दिए जाते हैं ताकि उनके माँ बनने में दिक्कत ना आये. ऐसे में स्तन- मुक्ति सिर्फ एक निजी फैसला नहीं रह जाता.
इस ख़बर से किसी को हिम्मत मिली हो या न मिली हो, एंजलीना की स्वीकारोक्ती ने इस प्रतिबंधित विषय को मीडिया के जरिये हर घर के ड्राइंग रूम तक तो पहुंचा ही दिया है. हालांकि समाज के सौन्दर्य मानकों को वो भी धता- बता नहीं सकीं और ब्रेस्ट ट्रांसप्लांट करवा ही लिया. इसका एक कारण ये भी है कि जिस प्रोफेशन में वो हैं, उसमें रहकर सौन्दर्य मानकों की अनदेखी कर पाना मुमकिन नहीं है. कोशिश ये करनी होगी ये तमाम बहस कुछ ठोस बदलाव ला सके. औरतें फार्मा कंपनी के फैलाये आतंक के जाल में ना आये और ना ही सामाजिक दबाव में आकर अपने स्वास्थ्य की अनदेखी करें. साथ ही उनके पास इतनी जानकारी और संसाधन हों कि वो सोच समझ कर स्तनों को रखने या न रखने का फैसला ले सकें. इस खबर ने कम से कम शुरूआती माहौल तो तैयार कर दिया है.

Sunday, May 12, 2013

हमारी निकम्मी मम्मियां

उन्हें सारी चीज़ों के भाव रटे होंगे. वो दूधवाले के नागों का, कामवाली की छुट्टियों का, किराने की दूकान के उधारों का मुंहज़बानी हिसाब रखेंगी. फल- सब्ज़ी वालों से मोल- तोल करके सबसे सस्ता सौदा खरीद कर लायेंगी. पर बजट की घोषणा होगी तो आप अखबार झपट लेंगे- ‘ये पॉलिटिक्स है मम्मी, आप नहीं समझेंगी.’
ये दिन भर मिक्सी, कुकर, चूल्हे से जूझेंगी. वाशिंग मशीन, माइक्रोवेव और फ्रिज के अति कॉम्प्लिकेटेड बटनों के साथ माथापच्ची करेंगीं. लेकिन कम्प्यूटर और कार की सीटों पर आप कुंडली मारकर बैठ जायेंगे- ‘ये नयी टेक्नॉलोजी है मम्मी, आप नहीं समझेंगी.’
ये सुबह आपको जगाएँगी. आपके इस्तेमाल की सब चीजें तैयार रखेंगी. घर से निकलने से पहले मोबाइल, पर्स, पैसे रख लेने की याद दिलाएंगी. आपके वापस आने से पहले आपका अस्त- व्यस्त किया कमरा कोरा- चिट्टा कर देंगी. बाहर आप माँ- बाप का प्रोफेशन पूछे जाने पर आप धीमे सुर में बोलेंगे- ‘मेरी मम्मी कुछ नहीं करतीं, वो हॉउसवाइफ हैं.’
आप के इस मनोवैज्ञानिक रोग की छूत धीरे- धीरे इन्हें भी लग गयी है. ये ना अपना मनपसंद खाना बनाएंगी, ना अपने कपड़े- लत्तों का ध्यान रखेंगी. आपके सर दर्द भर से इनके माथे पर शिकन आ जाएगी लेकिन अपनी बीमारियों को कोई बड़ी बात नहीं समझेंगी. कुछ पूछने पर कहेंगी- ‘अरे मेरा क्या है मैं कौन सी कामकाजी हूँ, दिन भर घर पर ही तो रहती हूँ.’
अगर आपकी मम्मियां भी ये सारे लक्षण दिखाती हैं- अपनी मर्जी का खाती- पहनती नहीं, दिन भर तेल- हल्दी से सने कपड़े लादे रहतीं हैं, अपने ऊपर पैसे खर्च करने से कतराती हैं, उनका फेवरेट कुछ भी नहीं है, सबकी पसंद को ही अपनी पसंद बताती हैं, कभी साथ बैठ कर खाना नहीं खाती, बाद में सबका बचा- खुचा बटोरती हैं. तो समझ जाइए कि आप बहुत बीमार हैं (आपकी मम्मी नहीं). आप ‘माय मदर डज़ नॉट वर्क सिंड्रोम’ से ग्रस्त हैं.
दरअसल कुछ काम करने का हमारा सीधा मतलब कुछ पैसे कमाने से है. जो कमाता नहीं, वो कुछ नहीं करता. इसी तरह जिस काम के लिए हमें ठोस मुद्रा के रूप में कोई कीमत नहीं चुकानी पड़ती उसकी हमें कोई क़द्र नहीं होती. हमारी मम्मियों का काम भी इसी श्रेणी में आता है. घर- बच्चे संभालने को किसी भी समाज में कोई बड़ा या बौद्धिक काम नहीं समझा जाता.
लड़कियों को जबरन घरेलू कामों की शिक्षा देना और उनकी इच्छा के विरुद्ध उन्हें गृहकार्य और मातृत्व की तरफ़ धकेले जाना बुरा है. लड़कियां प्राकृतिक रूप से इन कामों में दक्ष होती हैं, ये हमारा भ्रम है. अगर ऐसा होता तो फाइव स्टार होटलों के शेफ से लेकर चाट का ठेला लगाने वाले तक, पड़ोस के दर्जी से लेकर फैशन डिज़ाइनर और नामी पेंटर- डांसरों तक सब के सब ज्य़ादातर पुरुष नहीं होते. लड़कियों को अपना करियर छोड़ कर घर पर ध्यान लगाने के शिक्षा देते रहना बुरा ज़रूर है लेकिन इसका हल घरेलू औरतों की अवमानना नहीं है. इसका हल उनके काम की क़द्र किया जाना है. अगर हम लड़कियों के डॉक्टर, इंजीनियर बनने की सराहना करते हैं तो उनके गृहणी बन जाने को उनकी शिक्षा का बेकार जाना क्यों समझ लेते हैं? अगर महिला अपनी मर्जी से घर- बच्चे संभालने का निर्णय लेती है तो इसमें कोई बुराई नहीं. बुराई है पहले तो उनको ऐसा करने पर मजबूर किये जाने में और फिर उनको घर में दोयम दर्जा देने में और ये समझने में कि जिस औरत ने सिर्फ बच्चे पैदा किये और घर संभाला उसने कोई महत्वपूर्ण काम नहीं किया. सबसे भयंकर बात ये है कि खुद गृहणियों ने भी इन सारे पूर्वाग्रहों को सही मान लिया है. वो खुद भी अपने शारीरिक- मानसिक सेहतमंदी को प्राथमिकता नहीं देती. हमें खुद को और उनको भी ऐसी सोच से बचाना होगा. 
मेरी नजर में एक आदर्श समाज वो होगा जहाँ स्त्री- पुरुष में से कोई भी अपनी- अपनी क्षमता और रूचि के हिसाब से अपना काम चुन सकेंगे और अपनी घरेलू जिम्मेदारियों को साझा कर सकेंगे.  इसके लिए उन्हें किसी की आलोचना का डर नहीं होगा. ना तो लडकियों के करियर चुनने पर कोई बंदिश होगी और न ही हॉउसवाइफ होने को पिछड़ेपन की निशानी समझा जाएगा. ऐसे समाज को बनाने के लिए सबसे पहले घर के कामों को और इन्हें करने वालों को उचित महत्त्व दिया जाना ज़रूरी है.

दो विशेष बातें-
१.      ये (उपदेश) लड़के और लड़कियों दोनों के लिए है. अपनी मम्मियों को निकम्मा मानने में हममें से कोई भी कम नहीं है!
२.      ये कोई मदर्स डे विशेषांक नहीं है. कुछ बीमारियाँ हमारी सोच और समाज को लगातार त्रस्त करती आ रहीं हैं. इनसे लड़ने की कोशिश भी उतनी ही व्यापक और निरंतर होनी चाहिए. ये डे- फे तो सिर्फ आर्चीज़- हॉलमार्क का भला करने के लिए बने हैं.




Sunday, May 5, 2013

खेल खेल में........

खेल खेल में क्या से क्या हो जाता है... लड़के नेशनल यूनिफॉर्म में मैदान में उतरते हैं और लड़कियां हाथ में झालरें लेकर आधे- अधूरे कपड़ों में चीयरगर्ल्स बनती हैं. वो देश का गौरव बढ़ाते हैं ये ग्लैमर बढ़ाती हैं. क्रिकेट की खबरों से पटे पड़े अखबारों से महिला क्रिकेट की खबरें नदारद हो जाती हैं. सानिया मिर्ज़ा की उपलब्धियां भले ही बिसर जाएँ पर उनकी नथ ज़रूर याद रह जाती है. जेंडर हमारे जीवन में जाने- अनजाने किस हद तक घुस आता है ये जानने के लिए ज्यादा पोथियाँ पढ़ने की जरूरत नहीं बस स्पोर्ट्स की खबरें देख- पढ़ डालिए.

विदेशों में महिला खिलाड़ियों की न्यूड तस्वीरें पत्रिकाओं के कवर पृष्ठ की शोभा बढ़ातीं हैं. सफल महिला एथलेटिक को बिना जाने- पूछे समलैंगिक मान लिया जाना भी आम है. हमारे यहाँ सामाजिक बंधन इतना ग़ज़ब तो नहीं होने देते. लेकिन यहाँ भी महिला और पुरुष खिलाड़ी मीडिया में अलग- अलग तरह से प्रोजेक्ट किये जाते हैं. पुरुष खिलाड़ियों के साहस, जुझारुपन और कड़े ट्रेनिंग प्रोग्राम पर फ़ोकस किया जाता है. महिला खिलाड़ी या तो लोकप्रिय मीडिया से नदारद रहतीं हैं या फिर उनके प्रदर्शन से ज्यादा उनके पति- बच्चे, नथ- बिंदिया और फैशन सुर्ख़ियां बनाते हैं. हाल ही में ओलम्पिक मेडल जीतने वाली एम. सी. मैरी कॉम तमाम ख़बरों में ‘दो बच्चों की माँ’ कहकर संबोधित की गयीं. उनकी शादी, प्रेमकहानी, पति और जुड़वां बच्चों पर स्पेशल फीचर निकाले गए. एक प्रतिष्ठित मैगज़ीन ने उन्हें अपने कवर पेज पर जगह तो दी पर वो भी एक वीमेन स्पेशल अंक था जिसमें वो मय मुकुट- मेकअप- गुलाबी ईवनिंग गाउन, विराजमान थीं. मानों अभी- अभी कोई ब्यूटी पेजेंट जीता हो या बॉक्सर होने की माफ़ी मांग रहीं हों. पहली नजर में शायद आपको इसमें कोई बुराई न लगे. यहाँ सवाल अच्छे- बुरे का नहीं बराबरी का है. अगर खेलों में लिंगभेद न होता तो मैरी कॉम सिर्फ महिलाओं की नहीं, हम सब की आदर्श कहलातीं. या फिर स्पोर्ट्स पेज की सुर्खियाँ कुछ यूँ होतीं-
“दो बच्चों के पिता सचिन ने आज अपना सौवां शतक लगाया.”
“हाल ही में शादीशुदा धोनी की कप्तानी में भारत ने विश्वकप जीता.”
मैं मीडिया क्रिटिक नहीं हूँ. न ही इस लिंगभेद के लिए अकेले पत्रकारों को दोषी संमझती हूँ. वो हमारे बीच से ही आते हैं. जो हमारी सोच वही उनकी सोच है. हमारी डिमांड की दिशा में ही उनकी लेखनी गतिशील होती है. स्पोर्ट्स हमारी नज़र में एक मर्दानी एक्टिविटी है. लड़कियों की नज़ाकत और लड़कों की आक्रामकता हमारी नजर में उनका प्राकृतिक या बायलौजिकल गुण है. पुष्ट मांसपेशियों वाली सफल महिला खिलाड़ी हमारी इस अवधारणा को कड़ी चुनौती देती हैं. जहाँ पुरुष एथलीटों को हीरो मानने में हमें कोई परेशानी नहीं होती वहीँ महिलाओं को मज़बूत और जुझारू खिलाड़ी के रूप में पचा पाना हमारे लिए बड़ा मुश्किल होता है. वो हमारे ‘नॉर्मल’ औरत के खांचे में फिट नहीं बैठतीं. इस कारण हमें वो खेल के मैदान के बजाय विज्ञापनों में तेल, चावल, शैम्पू बेचते या घरेलू बातें करतीं ज्यादा सुहातीं हैं. उन्हें किसी की पत्नी, माँ या फिर चीयरगर्ल की भूमिका में देखकर हमें तसल्ली हो जाती है कि चलो एथलीट सही, पर ये हैं तो औरतें ही. हम महिला खिलाड़ियों के लिए धन के कमी का रोना रोते वक्त भूल जाते हैं कि इसके लिए मीडिया या पुरुष खिलाड़ी ज़िम्मेदार नहीं है इस असमानता में हम सबकी भागीदारी है. वीमेन स्पोर्ट्स को मिलने वाला कम कवरेज, उनके लिए धन और प्रायोजकों की कमी हमारी इस मानसिकता का परिणाम है.
अमरीकी स्कूलों में हाल ही में किये गए एक शोध के दौरान सामने आया कि बहुत सी लड़कियां खेल-कूद में जान- बूझ कर ख़राब परफॉर्म करती हैं ताकि उन्हें ‘मर्दानी’ औरत ना समझ लिया जाए. स्कूल- कॉलेज तो बहुत दूर की बात है. लड़कों को मर्द और लड़कियों को नारी बनाने की प्रक्रिया तो बचपन से ही शुरू हो जाती है जब हम लड़कों को खेलने के लिए कार- बंदूकें और लड़कियों को गुड़िया और किचेन सेट देते हैं.
लेकिन ऐसे भी लोग हैं जो धारा के विपरीत बहने की हिम्मत कर रहे हैं. तमाम विषमताओं के बावजूद, हमारे देश में हर तरह के खेलों में हिस्सा लेने वाली महिलाओं की संख्या साल-दर-साल बढ़ रही है. हमारी महिला क्रिकेट टीम पर धन और विज्ञापनों की बरसात नहीं होती, पर इसके बावजूद उनकी आई. सी. सी. रैंकिंग प्रथम है.
उम्मीद है कि हम सब जल्द ही उन्हें वो जगह और सम्मान देने के लिए मानसिक रूप से तैयार हो पायेंगें जिसकी वो हकदार हैं. ये भी ध्यान रखना होगा कि इस मामले में हम पश्चिमी मीडिया की अंधाधुंध नक़ल न करें जो महिला खिलाड़ियों को कवरेज तो ज्यादा देते हैं पर सही वजहों से नहीं.